श्लोक १ : चेतन और जीवत्व का निरूपण
वक्ता ने पिछले सत्र के आधे छूटे श्लोक १ की चर्चा को पुनः आरंभ किया। इसमें सुखदेवजी द्वारा चेतन और जीवत्व के निरूपण को समझाया गया। अनुभव रूप परब्रह्म यानी आत्मा के साथ देहादि पदार्थों का संबंध उसकी माया के बिना ठीक नहीं बैठता, जैसे स्वप्न देखने वाले को उसकी भूल से शापनिक अन्य पदार्थों के साथ संबंध हो जाता है। भगवान की दो कोटियाँ (सदानंद और सच्चिदानंद) और जीव में सात धातुएँ तथा दस प्राणों का विश्लेषण किया गया। भगवान की क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और आनंदशक्ति पर भी प्रकाश डाला गया। काल के परिवर्तन और सृष्टि के दो प्रकार — अकस्मात सृष्टि (यथा अग्नि स्फुल्लिंग) और क्रम सृष्टि (नाभि कमल से ब्रह्मादि) — को दृष्टांतों सहित समझाया गया। वेद में सृष्टि का निरूपण 'बहु श्याम' इच्छा से होता है, किंतु स्थिति और संहार अनुपत्ति से ही सिद्ध हैं, क्योंकि सृष्टि का आविर्भाव और स्थिति का तिरोभाव संहार कहलाता है। विज्ञान के माध्यम से भी अकस्मात सृष्टि के उदाहरण दिए गए, जैसे बरसात में झींगुरों का एकाएक प्रकट होना।
श्लोक १ : जीव का आविर्भाव और तिरोभाव
इस खंड में जीव के आविर्भाव (जन्म) और तिरोभाव (मृत्यु/मोक्ष) की प्रक्रिया को चिदंश के संदर्भ में समझाया गया। विषयों को स्वीकार करना और उनका अभिमान करना जीव का जन्म कहलाता है, जबकि मृत्यु पर्यंत विस्मृति या मोक्ष अभिमान का ना रहना है। भगवद्गीता के अध्याय ८, श्लोक १८-१९ से अव्यक्त से व्यक्त पदार्थों के आविर्भाव और रात्रि में अव्यक्त में लीन होने की प्रक्रिया समझाई गई। वक्ता ने स्पष्ट किया कि मृत्यु के बाद भी जीव के आंतर और बाह्य प्रयत्न (प्रारब्ध और देह की खोज) स्वतंत्र रूप से बने रहते हैं, जिससे जीव मुक्त नहीं हो पाता। भगवान का अनुग्रह और उपेक्षा पर ही यह खेल सर्वदा होता रहता है। पूर्व सृष्टि के शब्द जात (जीवों के कर्म) भगवान की मूल इच्छा से उनमें बने रहते हैं, और पुनः सृष्टि रचना होने पर अभिव्यंजक क्रिया (वक्ता द्वारा भावों की अभिव्यक्ति) से सब कुछ होता है। शब्द समूह और प्रत्यय ज्ञान का अभाव नहीं होता। भगवान की कृपा से ही जीव माया से मुक्त होकर अपने चिद्रूप में स्थित हो सकता है, परंतु उसे जगतकर्ता शक्ति प्राप्त नहीं होती, क्योंकि वह सर्वश्रेष्ठता केवल आनंदमय भगवान की ही है। इस प्रक्रिया के समर्थन में विभिन्न श्रुतियों (सदैव सौम्य इदम अग्र आसी, आत्मा इद एक अग्र आशीषित, तर इच्छ, सो आकार मयत, प्रजा ये) के प्रमाण प्रस्तुत किए गए। 'पूर्णमदः' आदि श्रुतियों से सच्चिदानंद के सत्, चित्, आनंद तीनों अंश पूर्ण सिद्ध हैं। 'सर्व एवन' और 'तस्माद वादि' श्रुतियाँ क्रम सृष्टि की सिद्धि करती हैं। 'नाम रूप व्याकरण वापी' से विविधता का संकेत और प्रवेश बताया गया है। 'पादोस भूतानी' श्रुति सबको ब्रह्म का श्वास कहती है। 'मुव लेला पीव' से जीव का बन्धन और 'तम कृतम पश्यति सोकर धातु प्रसाद' से भगवत कृपा से जीव का मोक्ष भी बताया गया है।
श्लोक १ : शुद्ध चेतन को देह संबंध और व्यामोह
यहां वक्ता ने सुखदेवजी के राजा परीक्षित को 'राजन' संबोधन का अर्थ समझाया कि उन्हें भी माया ने मोहित कर रखा है और स्वरूप का अज्ञान होने से वे दया के पात्र हैं। मूल श्लोक में संक्षेप से कहा गया है कि अपने चिद्रूप स्वरूप की माया के मोह के सिवाय शुद्ध चेतन को देह का संबंध नहीं हो सकता। अनुभवरूपी शुद्ध चेतन जीवात्मा वस्तु दृष्टि से अनुभव रूप है, किंतु अनुभव स्वरूप सामर्थ्य धर्म आनंद भगवान में चला गया है, जिससे माया का मोह होता है। यदि ऐसा न होता, तो आत्मा का देह और माया से संबंध नहीं होता। केवल शक्ति का अभाव रहता तो माया से व्यामोह न होता और देह संबंध निरूपण के लिए कारण न मिलता। यदि व्यामोह न माना जाए, तो जीव सदंश की तरह जड़वत हो जाता, चेतन नहीं रहता। विपरीत ज्ञान को व्यामोह कहते हैं, जिसके होने से जीव का देह से संबंध होता है। अनुभव शक्ति चेतन की स्वाभाविक शक्ति है। यदि अनुभव शक्ति का सहचर (सत्य और उच्च चेतना से निकट) रहता, तो व्यामोह न होता। 'प्रजा ये' इस भगवत इच्छा से ही तिरोभाव हुआ है, जिससे माया दोष रूप दिखती है। वास्तव में, सहज शक्ति होने से यह दोष नहीं, गुण है। माया को दूर करना आवश्यक है।
प्रश्नोत्तर : माया का स्वरूप और निवारण
इस खंड में उपस्थित श्रोताओं के विभिन्न प्रश्नों का समाधान किया गया। 'अव्यक्त का अव्यक्त हो जाता है' पंक्ति को स्पष्ट किया गया, जहाँ व्यक्त होकर तिरोहित होने पर वस्तु पुनः अव्यक्त हो जाती है। दूसरे प्रश्न में 'अभिव्यंजक क्रिया' का अर्थ समझाया गया, जो अभिव्यक्ति की क्रिया है, जैसे अभिनय में भाव-भंगिमाएँ। तीसरे प्रश्न में जीव के 'आंतर और बाह्य प्रयत्न' पर चर्चा हुई, जो मृत्यु के बाद भी उसके प्रारब्ध और आगामी जन्म की खोज के रूप में बने रहते हैं। यह प्रश्न बना रहता है कि माया गुण रूपा है तो उसे दूर करने के लिए क्यों प्रयत्न करें? इसका उत्तर यह है कि भले ही अनुभव शक्ति प्राप्त कर ली जाए, पर माया द्वारा जीव का हीन भाव नहीं जाएगा, क्योंकि भगवान ने माया को बंधन करने का अधिकार दिया है। भगवान की इच्छा अप्रतिहत (निर्बाध) होती है, अतः माया को तर जाने का उपाय करना आवश्यक है। माया के द्वारा चेतन का व्यामोह होने पर देह आदि से संबंध होना सहज हो जाता है। दृष्टांत दिया गया कि जैसे निद्रा से व्यामोह जीव स्वप्न में भगवत कृत माया को अपने से जुड़ी देखता है। परंतु निद्रा और माया में भेद है। निद्रा बुद्धि की वृत्ति है, एकदेश स्थित है, और काल से निवृत्त हो जाती है। माया भगवत शक्ति है, व्यापक है, और भगवान की आज्ञा से जीवों को मोहित करती है। इसलिए माया के मोह का काल से दूर होना अशक्य है, अतः इसे दूर करने के लिए उपाय करना चाहिए। माया क्षेत्र जगत का दर्शन कराने वाली है, बनाने वाली नहीं। यह माया करोड़ों जन्मों तक जीव का पीछा नहीं छोड़ती क्योंकि लिंग शरीर में संचित और क्रियावान कर्म उसके साथ रहते हैं। जीव स्वयं माया को दूर नहीं कर सकता, भगवान की कृपा से ही इसका निवर्तन होता है, जैसे भगवद्गीता में कहा गया है: 'मामेव प्रपद्यते मायामेतां तरन्ति ते' (जो मेरे ही शरण में आता है, वही मेरी इस माया को तरता है)।
श्लोक २ : माया का कार्य और अहम-मम भाव
वक्ता ने श्लोक २ का आभासार्थ प्रस्तुत किया, जिसमें यह जीव बहुरूप वाली मोहक माया के प्रभाव से स्वयं को बहुरूप वाला मानने लगता है। माया जगत के पदार्थों को बनाती नहीं, बल्कि केवल आभास पैदा करती है, यानी कुछ का कुछ दिखाती है। नरसिंह तापनी श्रुति में 'जीवे सो आभास करोति माया चाय भवति' कहा गया है। आभास का अर्थ है अन्यथा दर्शन, विपरीत ज्ञान या उल्टी समझ। यह मोहक माया आभास से विपरीत ज्ञान से जीव और ईश को अलग-अलग करती है। 'तस्मात् आत्म एव त्रविद योनिमति' श्रुति के अनुसार परमात्मा ही माया, अविद्या और जीव इन तीनों रूपों को धारण करने वाला है और सबका उपादान कारण भी है। यह मोहक माया बहुरूप है और अनेक रूपांतरों को दिखाने वाली है। जब जीव इसके साथ संबंध करता है, तो स्वयं को भी बहुरूप (रोगी, बलिष्ठ, दरिद्री, धनी) मानने लगता है। माया जीव को वास्तविक सच्चा स्वरूप देने में असमर्थ है, बल्कि उसे भ्रमित करती है कि माया के पदार्थों से आनंद मिलेगा। जीव माया के गुणों को ग्रहण कर 'मैं' और 'मेरा' का भाव जोड़ता है। इस श्लोक में अज्ञानी और देह संबंधी जीवों के ज्ञान का प्रकार दिखाया गया है, जो देह को अपना स्वरूप समझते हैं और देह संबंधी पदार्थों को अपना संबंधी समझते हैं। जगतकर्त्री माया और आभास मूल माया में अंतर स्पष्ट किया गया: सर्वभवन सामर्थ्य रूपा माया आभास रूपा नहीं है।