श्लोक ८ : ब्रह्मा जी की तपस्या और तीन विशेषण
वक्ता ने पूर्व में हो चुके विवेचन का संक्षिप्त पुनरावलोकन किया — अध्याय पाँच से सात तक उत्पत्ति-द्वारा-विचार और आठ से दस में उत्पत्ति-युक्ति के द्वारा विचार होता है। आठवें में शंका, नवम में उत्तर और दशम में फल है। श्लोक आठ का आभासार्थ है कि ब्रह्मा जी ने तप करना आरम्भ किया। श्लोकार्थ में बताया कि अमोग-दर्शन ब्रह्मा ने प्राण और मन को वश में किया, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय दोनों जीतीं और दिव्य हजार वर्ष पर्यन्त अखिल लोकों को तपा देने वाला तप किया। वक्ता ने बताया कि श्रम, योग-एकचित्ता और प्राणों को रोकने से जो श्रम हुआ वह तीनों मिलकर संताप बन सके — यह बात ब्रह्मा के तीन विशेषणों से सूचित की गई है।
श्लोक ८ : तीन विशेषणों का विस्तृत विवेचन
वक्ता ने अमोग-दर्शन का अर्थ स्पष्ट किया — जिनके दर्शन का प्रभाव निष्फल न हो, जिनका ज्ञान कभी खाली न जाए। इस विशेषण से ब्रह्मा के ज्ञान की प्रशंसा की गई है। अथवा ब्रह्मा ने जो पहले पदार्थों का निर्धार कर रखा था, उसकी प्रशंसा में यह कहा गया। अनिल-आत्मा विशेषण से प्राण और अन्तःकरण को जीतना और विजित-उभय-इन्द्रिय विशेषण से ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों दोनों को जीतना सूचित किया। वक्ता ने बताया कि इस विशेषण से योग के द्वारा प्राप्त शुद्धि और तप से प्राप्त शुद्धि — दोनों प्रकार की शुद्धि दिखाई गई है। इंद्रियों के नियत आहार विषयों का परित्याग करने से ब्रह्मा जी ने देह आदि को भी संतप्त किया।
प्रश्नोत्तर : ब्रह्मा के अंदर लोकों की स्थिति तथा ब्रह्मा की विशेष उत्पत्ति
प्रतिभागियों ने प्रश्न किया कि ब्रह्मा के अंदर भू आदि लोक कैसे विद्यमान हैं। वक्ता ने समझाया कि ब्रह्मा हिरण्यगर्भ हैं और ब्रह्माण्ड के अभिमानी प्रथम पुरुष हैं; ब्रह्मा के गर्भ में ही यह सब कुछ है, इसीलिए उनके तप करने से सभी लोक तप गए। ब्रह्मा जी की उत्पत्ति अग्नि-विस्फुलिंगन न्याय से नहीं, अपितु विशेष प्रयोजन से प्रभु के नाभि-कमल से हुई है — वो सृष्टि रचना के हेतु से प्रकट हुए। यह भी स्पष्ट किया कि ब्रह्मा जी के संदर्भ में माया का रोल नहीं आ रहा, अपितु उनका खुद का अभिमान — कि मैं ही हूँ, मुझको ही सब कुछ करना है — यह कारण पूर्व में बता दिया गया।
श्लोक ९ : भगवान ने ब्रह्मा को स्वलोक का दर्शन कराया
श्लोक नौ का श्लोकार्थ है कि भगवान ने सावधान रहकर ब्रह्मा को अपने लोक के दर्शन कराए — जो सर्वश्रेष्ठ लोक था। इस लोक में अविद्या आदि क्लेश, रजोगुण-कृत भूल-भुलैया और सत्त्वगुण-कृत उद्वेग — कुछ भी दोष नहीं रहते। परमात्मा-दर्शी महात्मा लोग ही इसकी स्तुति करते रहते हैं। व्याख्यार्थ में बताया कि ब्रह्मा ने भगवान की क्रीड़ा के लिए सृष्टि रचने का विचार किया, किन्तु भगवान किस लोक में विराजित हैं यह जानना ब्रह्मा के लिए असक्य था। अतः भगवान ने ब्रह्मा के गर्व को दूर करने के लिए पहले अपने निवास-योग्य निज लोक का दर्शन ब्रह्मा को कराया।
श्लोक १० : व्यापी बैकुण्ठ में रजस्, तमस्, मिश्र सत् और काल का प्रवेश नहीं
श्लोक दस का श्लोकार्थ है कि इस भगवत्धाम में रजोगुण, तमोगुण, सतोगुण और इनके मेल को भी प्रवेश नहीं; काल का पराक्रम नहीं चलता; माया भी नहीं है। यहाँ सुर और असुर दोनों से सेवित हरि भगवान के सेवकगण ही रहते हैं। वक्ता ने बताया कि कात्रिम बैकुण्ठ श्रीलक्ष्मीजी के अधिकार में है किन्तु यहाँ स्वलोक शब्द का प्रयोग होने से मालूम होता है कि अपने निज के रहने का व्यापी बैकुण्ठ — मुख्य अक्षरधाम — दिखाया। आध्यात्मिक और आदि-भौतिक लोकों को भी स्वरूप और सामर्थ्य प्रदान करने वाला आदिदेविक लोक ब्रह्मा जी को दिखाया।
प्रश्नोत्तर : विशुद्ध सत्त्व अक्षर के ब्रह्मत्व में बाधक क्यों नहीं
प्रतिभागी ने शंका की कि जब व्यापी बैकुण्ठ में विशुद्ध सत्त्व है तो अक्षर के ब्रह्मत्व में बाधक कैसे नहीं होता। वक्ता ने समझाया कि विशुद्ध तत्त्व ब्रह्मात्मक है — यह अक्षर ब्रह्म है, जो निराकार है। उसको लोकात्मक बनाने के लिए विशुद्ध सत्त्व के साथ संबंध भगवान कराते हैं, जिससे आकार तो आ जाता है परन्तु स्वरूप के साथ तत्त्व का कोई मेल नहीं होता। उदाहरण से बताया कि जैसे सोना-चाँदी-पीतल के पात्र सांचे में ढालने से आकार बन जाता है किन्तु लोहे के सांचे का कोई अंश पात्र में नहीं आता — उसी प्रकार अक्षर ब्रह्म साकार व्यापी बैकुण्ठ हो जाता है, किन्तु उसके बाहर-भीतर सर्वत्र अक्षर ब्रह्म के सिवाय कोई पदार्थ नहीं। यह सत्त्व का संबंध कर्मवश नहीं, भगवान की क्रीड़ेच्छा से होता है।