मंगलाचरण
[मंगलाचरण के श्लोकों का पाठ]
अध्याय ९, श्लोक ८-१० का संदर्भ
द्वितीय स्कन्ध के नवम अध्याय में जीव और ब्रह्म विषयक संदेह का निवारण और चतुःश्लोकी भागवत पर चर्चा चल रही है। अध्याय ८ से १० तक उत्पत्ति युक्ति के द्वारा विचार किया जाता है। आठवें अध्याय में शंका, नवम अध्याय में उत्तर और दशम अध्याय में फल का निरूपण किया गया है। यहाँ बताया गया है कि ब्रह्मा भगवान के उपादान कारण हैं और यह सारा जगत भगवत्स्वरूप है।
श्लोक ८ — ब्रह्मा द्वारा दिव्य तप
वक्ता श्लोक ८ का आभासार्थ और श्लोकार्थ प्रस्तुत करते हैं, जिसमें ब्रह्मा जी ने दिव्य हजार वर्ष पर्यंत अखिल लोकों को तपा देने वाला तप किया। उन्होंने प्राण और मन को वश में किया, ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय दोनों को जीता। श्रम सहने का संताप, योग और ज्ञान से प्राणों को रोकने का श्रम ब्रह्मा के लिए संताप बन सका। अमोग दर्शन का अर्थ है जिसका ज्ञान कभी खाली न जावे। इस विशेषण से ब्रह्मा के ज्ञान की प्रशंसा की गई है।
साधारण जीव और ब्रह्मा की तपस्या में भेद
साधारण जीवों में तपस्या से क्रोध, ग्लानि, उद्वेग और अहंकार जैसे दोष आ जाते हैं, किंतु ब्रह्मा असाधारण जीव थे, इसलिए उनमें ये दोष उत्पन्न नहीं हुए। उनके तप से भू और भू आदि लोक भी संतप्त होकर शुद्ध हो गए, जैसे धूप में वस्त्र सूखने से उनका गीलापन जाता रहता है। ब्रह्मा तपस्या करने वालों में अतिश्रेष्ठ थे और फल प्राप्ति के विषय में भी सावधान थे। उदाहरण दिया गया कि जैसे रसोई बनाने वाला रसोइया रस निष्पत्ति हो जाने पर ताप सहन करना छोड़ देता है, वैसे ही ब्रह्मा ने फल प्राप्ति पर तप छोड़ दिया।
ब्रह्मा के गर्भ में लोकों की स्थिति
चर्चा में प्रश्न उठाया गया कि ब्रह्मा में विद्यमान भू आदि लोक कैसे संतप्त हो गए, जबकि अभी सृष्टि की रचना नहीं हुई थी। इसके समाधान में बताया गया कि ब्रह्मा तो प्रथम अवतार हैं, उन्हें हिरण्यगर्भ कहा गया है और वे ब्रह्मांड के अभिमानी प्रथम पुरुष हैं। भगवान ने अपनी सारी सामर्थ्य ब्रह्मा में स्थापित की है, इसलिए इस समय ब्रह्मा के गर्भ में ही यह सब कुछ है, जिससे उनके तप से सभी लोक तप गए। ब्रह्मा को माया नहीं लगी, अपितु उनके अभिमान के कारण ज्ञान स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। भगवान ने उनको तप करने की आज्ञा दी ताकि उनको स्मृति प्राप्त हो।
ब्रह्मा का प्रथम अवतार और ज्ञान की प्रशंसा
ब्रह्मा जी की उत्पत्ति विस्फुलिंगन न्याय से न होकर विशेष प्रयोजन (सृष्टि रचना) से हुई है, वे प्रभु के नाभि कमल से प्राकट्य हुए हैं। ब्रह्मा को अमोग दर्शन कहा गया है क्योंकि वे बोलने वाले का मुख देखे बिना भी यह पता लगा सके कि भगवान क्या कहना चाहते हैं। यह उनके अमोग दर्शन होने का प्रमाण है। महाप्रभुजी ने यह व्याख्या पूरे स्कन्ध और शास्त्र को दृष्टि में रखते हुए लिखी है। ब्रह्मा को केवल 'तप' कहने मात्र से वे समझ गए और दिव्य वर्ष तक तप भी कर लिया।
श्लोक ९ — भगवत्-लोक का दर्शन
इस श्लोक में बताया गया है कि ब्रह्मा ने भगवान की क्रीड़ा के लिए सृष्टि रचने का विचार किया, किंतु भगवान किस लोक में विराजित हैं, यह जानना ब्रह्मा के लिए अशक्य था। इसलिए भगवान ने ब्रह्मा के गर्व को दूर करने के लिए पहले अपने लोक का दर्शन कराया। इसका तात्पर्य यह है कि भगवान ने ब्रह्मा को यह दिखाया कि मेरी क्रीड़ा होने के लिए कैसा विश्व चाहिए। यदि भगवान को अपने निवास के लिए योग्य लोक की रचना न करनी होती तो वे अपने लोक के दर्शन क्यों कराते, केवल अपने स्वरूप के ही दर्शन करा देते। इससे स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा को लोक रचना करने का जो गर्व था उसे दूर करने के लिए भगवान ने निवास योग्य निज लोक का दर्शन कराया।
भगवत्-लोक की श्रेष्ठता और गुण
भगवान ने ब्रह्मा जी को आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक लोकों को भी स्वरूप और सामर्थ्य प्रदान करने वाला आदिदैविक लोक दिखाया। कृत्रिम वैकुंठ श्रीलक्ष्मी जी के अधिकार में है, किंतु यहाँ 'स्वलोक' शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ है अपना निज का रहने का व्यापी बैकुंठ, मुख्य अक्षरधाम। यह लोक सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें अविद्या आदि क्लेश, रजोगुण कृत भूल-भुलैया और सत्वगुण कृत उजास से घबरा जाना जैसे कोई दोष नहीं रहते। परमात्मा दर्शी महात्मा लोग ही इसकी स्तुति करते हैं।
श्लोक १० — भगवत्-धाम का स्वरूप
इस श्लोक में भगवत् धाम द्वापी बैकुंठ का स्वरूप बताया गया है, जहाँ रजोगुण, तमोगुण, सतोगुण और उनके मेल को भी प्रवेश बिल्कुल नहीं है। यहाँ काल का पराक्रम नहीं चलता और माया भी नहीं है। यह धाम निर्दोष है क्योंकि यहाँ काल, कर्म, स्वभाव, जीव, माया, प्रकृति, आदि का कोई प्रभाव नहीं होता। विशुद्ध सत्व अक्षर ब्रह्म में बाधक नहीं होता, क्योंकि विशुद्ध सत्व ब्रह्मात्मक है और वह केवल आकार समर्पण के लिए होता है, स्वरूप के साथ तत्व का मेल नहीं होता। जैसे सोने, चांदी, पीतल के ढाल व पात्र आदि बनाए जाते हैं, उनमें सांचे का कोई अंश नहीं जुड़ता, उसी प्रकार विशुद्ध सत्व का संबंध आकार के लिए ही होता है।
विशुद्ध सत्व और अक्षर ब्रह्म का संबंध
अक्षर ब्रह्म तिरोहितकार निराकार है, अतः उसको लोकात्मक बनाने के लिए उसका विशुद्ध तत्व के साथ संबंध भगवान कराते हैं। इस तत्व संबंध से उसमें आकार तो आ जाता है, पर उसमें और कोई भी गुण संबंध नहीं आता। जैसे पीतल के वासनों में बाहर-भीतर पीतल रहता है, अन्य कोई पदार्थ नहीं रहता, उसी तरह यहाँ भी अक्षर ब्रह्म साकार व्यापी बैकुंठ हो जाता है, किंतु उसके बाहर भीतर सर्वत्र अक्षर ब्रह्म के सिवाय अन्य कोई भी पदार्थ नहीं है। सत्व का यह संबंध कर्मवश नहीं, अपितु भगवान की क्रीड़णार्थ इच्छा से होता है। आकार शुद्ध सत्व से आता है, जबकि मूल पदार्थ आनंद है, और शुद्ध सत्व एक सांचे का काम करता है।