मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के मंगलाचरण के लिए है। इसमें अज्ञानतिमिरान्धस्य, नमामि हृदयशेषलीलाम् और लक्ष्मीसहस्रलीलाभसेव्यमानं कला जैसे श्लोकों का पाठ किया गया है। इस खण्ड में किसी प्रकार की विषय-वस्तु का विवेचन नहीं किया गया है, और न ही मंगलाचरण के किसी अर्थ या भावार्थ पर कोई चर्चा हुई है। वक्ता ने मंगलाचरण के पश्चात ही सत्र की मुख्य विषय-वस्तु पर ध्यान केंद्रित किया।
द्वितीय स्कन्ध, अध्याय ९ का परिचय एवं श्लोक ९-१० का सार
सत्र की शुरुआत द्वितीय स्कन्ध के अध्याय नौ के परिचय से होती है, जिसमें मनन विमर्श प्रकरण चल रहा है। इसमें जीव और ब्रह्म विषयक संदेह का निवारण चतुःश्लोकी भागवत के माध्यम से किया जा रहा है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि अध्याय आठ में शंका, नौ में उसका उत्तर और दस में फल बताया गया है। भगवान ही ब्रह्म के मूल उत्पत्ति स्थान हैं, अर्थात वे ही ब्रह्मा के उपादान कारण हैं। वक्ता ने श्लोक ९ का अर्थ बताया कि भगवान ने ब्रह्मा को अपने लोक के दर्शन कराए, यह सर्वश्रेष्ठ लोक है जहाँ अविद्या, क्लेश, रजोगुण या सत्वगुण कृत दोष नहीं रहते। श्लोक १० के अनुसार, इस भगवत् धाम (व्यापी वैकुंठ) में रजोगुण, तमोगुण, सत्वगुण और इनके मेल का भी प्रवेश नहीं है, न ही काल का पराक्रम चलता है, और न ही माया है। यहाँ केवल सुर और असुर दोनों के सेवित हरि भगवान के सेव गण निवास करते हैं।
श्लोक १० की व्याख्या: अक्षर ब्रह्म में माया, काल, गुणों का निषेध
इस खण्ड में श्लोक १० की व्याख्या करते हुए वक्ता ने अक्षर ब्रह्म में काल और गुणों के प्रभाव का विस्तृत निरूपण किया। बताया गया कि जिस पदार्थ में शोक दिलाने वाला काल पहुँच सकता है, वहीं गुण रह सकते हैं; काल के बिना गुणों की स्थिति व्यर्थ है। लेकिन अक्षर रूपी व्यापी वैकुण्ठ में काल का पराक्रम नहीं चलता, क्योंकि काल स्वयं भगवान का ही एक रूपांतर है और अक्षर में ही रहता है। वक्ता ने दृष्टान्त दिया कि भगवान सच्चिदानंद स्वरूप हैं, और जब सृष्टि रचना की इच्छा होती है, तब अपने धाम धर्मों को पृथक करते हैं, जिससे आनंद का अंश कुछ छिप जाता है और सत की वृद्धि होती है। 'एको ब्राह्मण आनंदे' तथा 'यतो वाचो निर्वनते' जैसी श्रुतियों के माध्यम से ब्रह्मानंद की औपचारिक गिनती का तात्पर्य समझाया गया, जो वास्तविक नहीं, बल्कि जिज्ञासुओं को समझाने हेतु है। वक्ता ने दृढ़ता से कहा कि अक्षर ब्रह्म धाम में मोहिका माया का भी कोई प्रभाव नहीं है, क्योंकि यदि माया होती तो जीव को ब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति कैसे होती। 'अक्षरस्य प्रशासने गार्गी धावा पृथ्वी विभते' श्रुति से स्पष्ट है कि आनंद के ही सब सामर्थ्य हैं और अक्षर का प्रशासन स्थिर रहता है।
भगवत् भक्तों का स्वरूप एवं लीला
वक्ता ने यहाँ यह शंका प्रस्तुत की कि यदि भगवान के सेवक पराधीन होते हैं, तो उन्हें बद्ध जीव कहना ठीक होगा। इसके उत्तर में उन्होंने 'हरे अनुज्ञाता' श्लोक का सन्दर्भ देकर स्पष्ट किया कि भगवत् भक्तों का व्रत भी भगवान के सदृश ही होता है। भगवान का स्वभाव शरणागत पालन व्रत है, जो अंचनात्मक (अनशन) भी है। गीता के श्लोक 'ये यथा माम प्रपद्यते तामस्ते भजायं' का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान जिस भाव से भजते हैं, उसी रूप में दर्शन देते हैं और रक्षा करते हैं। शबरी आदि भक्तों के उदाहरण से समझाया कि भगवान उन्हें उनकी अवस्था में स्वीकार कर उनका वास्तविक हित करते हैं। वक्ता ने कहा कि व्यापी वैकुण्ठ में नारद आदि पार्षद भी भगवान जैसे ही हैं, क्योंकि उनमें भगवान का दिया हुआ बल ही है। भगवान और भक्त दोनों लोक में जीवों के उद्धार के लिए प्रकट होते हैं, और लौकिक भोग व कर्म फलों का भोग नहीं करते, जिससे वे कर्मबंधन से मुक्त रहते हैं। अंत में, यह भी बताया कि भगवत् गण जब बैकुण्ठ में निवास करते हैं, तो सुर और असुर दोनों उनकी पूजा करते हैं, क्योंकि वे विशुद्ध तत्व से परे होते हैं।
प्रश्नोत्तर: उपासना ज्ञान और असुरों का सुख
प्रश्नोत्तर के इस भाग में 'उपादान परोक्षाद ज्ञान' जैसे कुछ स्पष्ट न हुए शब्दों पर चर्चा हुई, जिसका उत्तर वक्ता ने मूल में छपी त्रुटि के कारण कह पाना कठिन बताया, पर यह स्पष्ट किया कि अक्षर में आनंद तिरोहित सा हो जाता है। एक प्रतिभागी ने शंका की कि सेवक को बद्ध जीव क्यों नहीं कहना चाहिए, जबकि वे पराधीन होते हैं। वक्ता ने स्पष्ट किया कि अक्षर धाम में माया न होने से बद्ध जीवों की बात नहीं, और 'हरे अनुज्ञाता' श्लोक इसी संदर्भ में आया है कि भगवान के सेवक भगवान जैसे ही होते हैं। असुरों द्वारा भक्तों की पूजा पर प्रश्न उठाया गया, जिस पर वक्ता ने समझाया कि वैकुण्ठ में रहने वाले भगवत् भक्त होते हैं, जिनकी स्तुति दिव्य लोक में रहने वाले सुर और असुर करते हैं। महाप्रभुजी के निबंध का उदाहरण देते हुए वक्ता ने समझाया कि भगवान विरोधी जीवों की सृष्टि भी अपनी लीला हेतु करते हैं, जैसे भोजन में विभिन्न रस रुचि बढ़ाते हैं, वैसे ही तामस जीवों के भोग द्वारा भगवान लीला का अनुभव करते हैं। अंत में, यह भी स्पष्ट किया गया कि कुछ असुरों को भगवत् संबंध से परम सुख का अनुभव होता है, क्योंकि प्रभु ने उन्हें स्मृति दे रखी होती है।
श्लोक ११-१२: भगवत् भक्तों का दिव्य स्वरूप और वैकुंठ की शोभा
इस खण्ड में वक्ता ने श्रीसुबोधिनी के श्लोक ११ और १२ का निरूपण प्रस्तुत किया, जिसमें भगवत् भक्तों के दिव्य स्वरूप और व्यापी वैकुण्ठ धाम की शोभा का वर्णन है। श्लोक ११ का श्लोकार्थ बताते हुए वक्ता ने कहा कि भगवान के पार्षद श्याम और स्वच्छ रूप वाले, पीतांबर धारण किए हुए, शीत मधुर प्रकाश युक्त कोमल श्री अंग वाले होते हैं। वे सभी चार भुजाओं से शोभित होते हैं, चमचमाते मणि श्रेष्ठों से जड़े हुए सुवर्ण आभरण धारण किए होते हैं, और आत्मकांत से प्रवाल, वैदुर्य, मृणाल के समान प्रभा वाले होते हैं, जिनके कुंडल और मस्तक की रत्नमालाएँ शोभायमान होती हैं। श्लोक १२ के आभासार्थ में कहा गया कि भगवत् धाम में लीला का अनुभव भी सुंदर होता है, और श्लोकार्थ के अनुसार, यह व्यापी वैकुण्ठ लोक से भी अधिक शोभायुक्त है। जैसे बिजली सहित मेघ पंक्तियों से आकाश चमकता है, वैसे ही यह लोक भी दिव्य महिला सहित पार्षदों और सुंदर विमानों की पंक्तियों से शोभायमान होता है। वक्ता ने जोर दिया कि व्यापी वैकुण्ठ में भगवान की इच्छा से ही सब कार्य होते हैं, काल आदि गुणों का प्रभाव वहाँ नहीं है, और लीला का अनुभव अत्यंत सुंदर होता है।
प्रश्नोत्तर: धाम स्वरूप एवं लक्ष्मी/स्वामिनीजी
इस खण्ड में प्रतिभागियों ने धामों के स्वरूप से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। एक प्रश्न था कि रमा वैकुण्ठ और गोलोक धाम एक ही हैं या भिन्न। वक्ता ने स्पष्ट किया कि रमा वैकुण्ठ अलग है, जबकि व्यापी वैकुण्ठ ही गोलोक धाम है। एक अन्य प्रश्न में सत्, चित्त और आनंद के पाँच-पाँच गुणों पर स्पष्टीकरण माँगा गया, जिस पर वक्ता ने श्लोक ११ में वर्णित चतुर्भुज, मणिप्रवेक आदि को चेतना के गुण बताया, और आनंद के गुणों के निरूपण की अनुपस्थिति पर चर्चा की। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न व्यापी वैकुण्ठ को गोलोक मानने पर लक्ष्मीजी के दर्शन और स्वामिनीजी की अनुपस्थिति को लेकर था। वक्ता ने समझाया कि 'लक्ष्मी सहस्त्र लीलाभिः सेव्यमानं कला' में कोई समस्या नहीं है, क्योंकि मुक्ति में और भगवत् लोक की प्राप्ति में भी तारतम्य होता है। भगवान विरुद्ध धर्माश्रय हैं और उनका धाम भी विरुद्ध धर्माश्रय है, अतः सबको यथाधिकार ही प्रतीति होती है। जो पुष्टि भक्त नहीं और जिसे ब्रज लीला की सुधि नहीं, उसको स्वामिनीजी के दर्शन कराने की आवश्यकता नहीं होती। वस्तु अनुभूति दृष्टा के सामर्थ्य से नहीं, बल्कि अनुभूयमान पदार्थ की इच्छा से होती है कि वह किसको किस तरह से दिखाई दे। ब्रह्मा को लक्ष्मी नारायण रूप में दर्शन होते हैं क्योंकि वे भगवान के पुत्र हैं, और उन्हें यशोदा संग लालित कृष्ण का दर्शन आवश्यक नहीं। भगवान की इच्छा ही सर्वोपरि है कि वे किसे किस रूप में प्राप्त कराते हैं।