मंगलाचरण
यह खंड मंगलाचरण के लिए है। इसमें वक्ता द्वारा भगवन्नाम स्मरण और वंदना की गई है।
श्लोक १४-१५ का निरूपण और द्वितीय स्कंध का सन्दर्भ
वक्ता ने आज श्लोक संख्या १४ और १५ का निरूपण करने का क्रम बताया और श्लोक १३ का निरूपण पिछली बार किया था। श्रीमद्भागवत को भगवान का नामात्मक स्वरूप बताया, जिसमें १२ स्कंध हैं। प्रथम स्कंध अधिकार का, द्वितीय स्कंध ज्ञानलीला साधनलीला का है, जिसमें संक्षेप से अंकुश सहित श्रवण का निरूपण किया गया है। तीसरे से १२वें तक के १० स्कंधों में भगवान की दस लीलाओं का विस्तार से निरूपण है। द्वितीय स्कंध में श्रवण के तीन अंग – तत्वज्ञान, रतप्रसाद और मनन – का वर्णन किया गया है। मनन के दो विभाग – उत्पत्ति से विमर्श और उपपत्ति से विमर्श – को स्पष्ट किया गया। नौवे अध्याय में भगवान को सर्व का मूल बताया गया है, तथा जीव और ब्रह्म के स्वरूप संबंधी शंकाओं का निराकरण किया गया है। वक्ता ने श्लोक १२ और १३ का सार भी दोहराया और श्लोक १४ का श्लोकार्थ प्रस्तुत किया, जिसमें भगवान के सात्वतों के पति, लक्ष्मीपति, यज्ञपति और जगतपति स्वरूप का वर्णन है।
श्लोक १४ की व्याख्या: भगवान के पति स्वरूप
वक्ता ने श्लोक १४ की व्याख्या करते हुए बताया कि ब्रह्मा जी को वैकुंठ का दर्शन कराने का प्रयोजन सृष्टि रचना के लिए आवश्यक सामग्री का ज्ञान कराना था। भगवान सच्चिदानंद रूप से आविर्भाव होकर ब्रह्मा जी को दर्शन कराते हैं, ताकि वे जान सकें कि सृष्टि में सत्, चित् और आनंद तीनों पदार्थ सम्यक रूप से रहेंगे। भगवान को सात्वत पति कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे विशुद्ध सत्व के निधि हैं और सत्वात्मक पदार्थों का स्वतंत्र उपयोग करने वाले हैं। सत्वात्मक पदार्थों में भगवत्सेवक, देवगण, धार्मिक गण और सात्विक जीव सम्मिलित हैं, जिनकी कार्यसिद्धि के लिए भगवान अवतार लेते हैं। भगवान लक्ष्मीपति हैं क्योंकि वे अपने भोग के लिए जगत का निर्माण करते समय सबको लक्ष्मी रूप बनाते हैं, और अक्षर ब्रह्म का आनंद लक्ष्मी का स्वरूप है। भगवान यज्ञपति हैं, वेदों की रचना करते समय यज्ञ भी अपने भोग के लिए बनाते हैं। अंततः, भगवान जगत के पति भी हैं, क्योंकि जगत उनकी क्रीड़ा के लिए है, और जगत तीन प्रकार का है – जीव भोग्य आधिभौतिक, भगवत् भोग्य आधिदैविक, और उभय भोग्य आध्यात्मिक। वक्ता ने अनुप्रवेश और अनुप्रवेशक की अवधारणा भी समझाई।
अनुप्रवेशक और अनुप्रवेशीय पदार्थों की व्याख्या तथा प्रश्नोत्तर
वक्ता ने समझाया कि इस श्लोक में जिन चार पदार्थों (सात्वत, लक्ष्मी, यज्ञ और जगत) का निरूपण हो रहा है, वे अनुप्रवेशक हैं और आधिदैविक रूप में साकार मूर्ति होकर विद्यमान हैं। दशम स्कंध में वर्णित पदार्थ अनुप्रवेशीय हैं। ब्रह्मा जी को सृष्टि रचना के लिए इन मूर्ति रूप पदार्थों का प्रदर्शन कराया गया है। पार्षद सुनंद, नंद, प्रबल, अरहण आदि भगवत्भक्ति के अधिष्ठाता देवता हैं। ये श्रवण, कीर्तन, स्मरण और अर्चन रूपा भक्ति के प्रतिपादक हैं। प्रश्नोत्तर में अनुप्रवेश और अनुप्रवेशक की प्रक्रिया पर चर्चा हुई, जिसमें आधिदैविक पदार्थों का आधिभौतिक और आध्यात्मिक जगत में अनुप्रवेश होने पर ही भगवान से संबंध होता है। लक्ष्मीपति और जगतपति के भेद को भी स्पष्ट किया गया कि भगवान जिसका भोग करते हैं वह लक्ष्मी स्वरूपा ही है, चाहे वह लक्ष्मी स्वयं हो या अन्य कोई जीव या पदार्थ।
भगवत्संबंध और नवधा भक्ति पर प्रश्नोत्तर
अनवतार काल में भगवत्संबंध कैसे होता है, इस पर प्रश्न उठाया गया। वक्ता ने समझाया कि ब्रह्मवाद के सिद्धांत के अनुसार सब कुछ ब्रह्म का ही परिणाम है और वस्तु मात्र की ब्रह्मरूपता स्वतः सिद्ध है। भगवान नित्य और व्यापक होने से उन्हें कहीं आना-जाना नहीं पड़ता, केवल संकल्प मात्र से प्रकट हो जाते हैं। जब कोई भक्त भजनीय बुद्धि स्थापित करता है, तो भगवान का प्राकट्य हो जाता है। यह व्यक्ति सापेक्ष है, जैसे अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की गई थी। प्रपंच विवेक में इस प्रक्रिया को विस्तार से समझाया गया है। नवधा भक्ति के संदर्भ में, यह चर्चा हुई कि चार भक्तियाँ (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन) भूतल पर सिद्ध होती हैं, और बाकी (पादसेवन, वंदन, दास्य, साख्य, आत्मनिवेदन) वैकुंठ में पहुँचने पर सिद्ध होती हैं। इन चार पार्षदों के नाम लोक में उनके विशेष प्रभाव के कारण गिनाए गए हैं, और उनकी सिद्धि से वैकुंठ में इत सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक १५ की व्याख्या: भगवान का सहज स्वाभाविक प्रसाद
श्लोक १५ की व्याख्या में कहा गया है कि इन सबके स्वामी भगवान पुरुषोत्तम हैं। यद्यपि वे सभी परिकरों से परिवेष्टित होकर विराजते हैं, तथापि अनुग्रह की वार्ता करने के लिए वे अपने वृत्तों (सेवकों) की ओर ही अधिक झुके रहते हैं। सेवकों पर भगवान का सहज स्वाभाविक प्रसाद और कृपा होती है। अन्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप पदार्थों पर क्रम से साधना आदि परंपरा से अनुग्रह होता है। धर्म शब्द से यज्ञ और जगत, काम शब्द से लक्ष्मी, और मोक्ष शब्द से भगवदीय भ्रत (या सात्वत) लिए गए हैं। प्रेम रूपा भक्ति पाँचवाँ पदार्थ है। भगवान की दृष्टि अन्य धर्मादि पदार्थों पर भी आसव होती है, उन्हें मदमस्त कर देती है, जिससे प्रपंच को भुला देने वाला ज्ञान भगवत्दृष्टि रूप है। माया भगवान के प्रसन्न हास रूपी शक्ति से कार्य करती है, जिससे शाश्वत, यज्ञ और लक्ष्मी जैसे भगवतीय पदार्थों को उन्माद होता है और वे ब्रह्मा के कार्य में सम्मिलित हो पाते हैं। भगवान के नयन कमल निर्मल हास से गुलाबी होते हैं, जिनकी ललाई का अल्प प्रकाश जगत का वास्तविक तत्व साक्षात्कार लौकिक जनता को सुखकर नहीं होने का तात्पर्य सूचित करता है, बल्कि उसका अल्प प्रकाश ही सामान्य जनता को सुखकर होता है।
भगवान के किरीट, कुंडल, भुजा आदि का आधार रूप निरूपण
भगवान आधार भी हैं और आधे भी हैं। सुनंद, नंद इत्यादि विशेषणों से आधे का निरूपण हुआ। अब आधार रूप निरूपण करते हैं। पाँच पदार्थों का आधार भगवान हैं, जिनमें किरीट, कुंडल, चार भुजा, पीतांबर और लक्ष्मी का चिन्ह सम्मिलित हैं। वेद भगवान का किरीट है, जिसका स्थान सत्यलोक है। योग सांख्य रूप कुंडल भगवान के कर्ण हैं, जिनका स्थान तपलोक और जनलोक है। महद आदि चार लोकों का आधार भगवान की चार भुजाएँ हैं। आनंद सुख रूप स्वर्ग का आधार भगवान का वक्षस्थल है। श्रीवत्स चिन्ह भी उनके वक्षस्थल पर है। इस तरह यह सिद्ध होता है कि भगवान ने ब्रह्मा जी को अपने विराट रूप का वास्तविक साक्षात्कार कराया, जिससे उन्हें आगे सृष्टि रचना करने में सरलता हो सके।