द्वितीय स्कंध, नवम अध्याय का अवलोकन
वक्ता नौवें अध्याय का अध्ययन कर रहे हैं, जो जीव और ब्रह्म के संदेह का निवारण करता है। पिछले अष्टम अध्याय में राजा द्वारा किए गए प्रश्नों के उत्तर यहाँ सुखदेव जी महाराज दे रहे हैं। ब्रह्मा जी की उत्पत्ति भगवान द्वारा हुई और उन्हें जब चारों ओर जल ही जल दिखाई दिया, तब उन्होंने तप किया। ठाकुरजी ने प्रसन्न होकर जगत की सृष्टि की उत्पत्ति हेतु अपने धाम का प्रभु ने उनको दर्शन कराया। ब्रह्मा ने पूज्य आसन पर विराजमान, चार, सोलह और पाँच शक्तियों से युक्त और अपने धाम में ही रमण करते हुए भगवान को देखा। इन दर्शनों से ब्रह्मा का हृदय हर्ष में मग्न हो गया, शरीर में रोमांच हो गया, प्रेम प्रभाव की अश्रु से नेत्र भर गए और ऐसी अवस्था में ही विश्व सृष्टा ब्रह्मा ने भगवान के चरण कमलों में प्रणाम किया।
अक्षर ब्रह्म के आसन का स्वरूप एवं त्रिविधता
वक्ता ने अक्षर ब्रह्म के लोकात्मक, आसनात्मक और शरणात्मक स्वरूप तथा व्यापी वैकुंठ आदि आदिभौतिक और आसन आध्यात्मिक स्वरूप को लेकर एक प्रश्न रखा। प्रतिभागी ने समाधान दिया कि अक्षर ब्रह्म का त्रिविध स्वरूप आदिभौतिक, आध्यात्मिक और आदिदैविक है। व्यापी वैकुंठ आदि लोक आदिभौतिक अक्षर है, जिस आसन पर प्रभु विराजे हैं वह आसन आध्यात्मिक है, और प्रभु के चरणारविंद आदिदैविक हैं। यह त्रिविधता देखने की दृष्टि पर निर्भर करती है, जैसे सिद्धांत मुक्तावली में जगत को आदिभौतिक, अक्षर को आध्यात्मिक और श्रीकृष्ण को आदिदैविक रूप कहा है। गंगा के उदाहरण से जल रूपा गंगा आदिभौतिक, तीर्थ रूपा गंगा आध्यात्मिक और देवी रूपा गंगा आदिदैविक है। भगवान के सिंहासन के तीन आवरण हैं: प्रकृति, पुरुष, महतत्व और अहंकार (चार चतुर्दल कमल की तरह); एकादश इंद्रियां और पांच तन मात्रा (सोलह दल वाले कमल की तरह); और पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)।
भगवान के असाधारण गुण और जीव का भोग
भगवान के सिंहासन के चारों ओर मूर्ति धारण किए ऐश्वर्य, यश, ज्ञान और वैराग्य ये छह ऐश्वर्य सेवक होकर स्थित थे। ये छह गुण भगवान में नित्य वर्तमान रहते हैं। प्रभु जिन पार्षदों, देवगणों और राजाओं को इनका दान करते हैं, वहाँ भी ये रहते हैं, किन्तु उतने समय पर्यंत ही वे भगवान कहे जाते हैं जितनी प्रभु की इच्छा हो। इससे यह स्पष्ट है कि भगवत्त्व भी भेदभाव से रहता है: भगवान का भगवत्त्व नित्य है, जबकि अन्य में वह कृपा से प्राप्त होता है और अनित्य होता है। 'ब्रह्म वेद ब्रह्मे भवति' आदि बातों में जो भगवत्त्व साधनों से प्राप्त होता है, वह साधारण और अध्रुव होता है, जबकि भगवान का भगवत्त्व असाधारण और नित्य है। प्रभु के पास भोग की सब सामग्री विद्यमान रहती है, और वे अपने धाम में ही रमण करते हैं क्योंकि उनका स्वरूप ही आनंद है। जो स्वयं प्रकाश है, उसे दूसरे प्रकाश की अपेक्षा नहीं होती। भगवान स्वयं प्रकाश रूप और सर्व समर्थ हैं, अतः अपने आनंद भोग में दूसरे कर्ता की अपेक्षा नहीं है। यह भी सूचित होता है कि जीवों द्वारा भगवान का भोग करना ठीक नहीं है, क्योंकि स्वयं प्रकाश भगवान जीव कृत साधनों से प्रकाशित या भोग्य नहीं हो सकते।
प्रश्नोत्तर — महाप्रभुजी की स्थिति एवं धाम लीला
एक सहभागी ने जिज्ञासा की कि वैकुंठ लोक में भगवान अपने पार्षद भक्तगणों से सेवित हैं, तो महाप्रभुजी की स्थिति वहाँ क्या होगी, क्योंकि वे भगवान के मुखारविंद स्वरूप कहे गए हैं और गोसाईंजी कृष्ण के अवतार। वक्ता ने समझाया कि यहाँ वर्णन परम पुरुष परम ब्रह्म का है, जो मर्यादा रूप लीला करते हैं। यहाँ बैकुंठ धाम के मर्यादा रूप ब्रह्मादि को गम्य दर्शन कराए गए हैं, रसात्मक नित्य सिद्धांत का वर्णन नहीं है। महाप्रभुजी और गोस्वामीजी आदि का उल्लेख उनकी ग्रंथन में अध्ययन किया जाता है। महाप्रभुजी के चरणचिन्ह की भावना में उल्लेख है कि लीला सृष्टि आप में से ही उत्पन्न हुई है, अतः आप और ठाकुरजी में कोई भेद नहीं है। पंकज भाई ने कहा कि पंचम पुरुषार्थ रूपी भक्ति के सेवकगण भी वहाँ विद्यमान थे, तो महाप्रभुजी जो भक्ति का उपदेश करते हैं, वह भी पंचम पुरुषार्थ रूपा भक्ति का ही है। जब महाप्रभुजी लीला समाप्त करके बैकुंठ में पहुंचे, तो उनकी किस अवस्था में स्थिति होगी? दूसरे सहभागी ने कहा कि यह डिपार्टमेंट ही अलग है जहाँ लीला व्यापी ठाकुरजी में लीन हो जावे।
प्रश्नोत्तर — प्रमाण और भावना का भेद, ब्रह्मा के दर्शन का प्रयोजन
वक्ता ने इस विषय को संवेदनशील बताया। प्रमाण शास्त्र आचार्य की वाणी से पुष्ट होकर बात समझाते हैं, जबकि भावना का प्रमाण से कोई लेना-देना नहीं है। भावना तन्मयता को बढ़ाती-घटाती है, पर तथ्य में कोई फर्क नहीं पड़ता। ब्रह्मा जी ने युक्तं भगस्वैश्वर्य आदि से युक्त भगवान को अपने धाम में रमण करते देखा। परम शब्द के प्रयोग से स्पष्ट है कि ये कोई अन्य देव नहीं, बल्कि परात्पर भगवान हैं। व्यापी वैकुंठ का अर्थ है जो सर्वत्र व्याप्त हो, इसलिए अन्य किसी लोक की कल्पना नहीं की जा सकती। ब्रह्मा को जितने दर्शन आवश्यक थे, उतने ही प्रभु ने कराए, क्योंकि प्रभु पृथ्वी का भोग करना चाहते हैं और अवतरित होना है। भगवान की सभी लीलाएं नित्य हैं। पुष्टि लीलाएं भी नित्य हैं और वैकुंठ में जहाँ कहीं भी होती हों, वे प्रचलित हैं। किन्तु ब्रह्मा का उसका अधिकार नहीं है और न आवश्यकता, इसलिए प्रभु ने उसके दर्शन नहीं कराए। पुष्टि लीला के कर्ता प्रभु विराजमान हैं, उसके लिए कोई अलग स्थान सोचने की आवश्यकता नहीं है। जो स्वरूप पर स्थित हैं, वे आदिदैविक, जिसके ऊपर विराजे हैं, वह आध्यात्मिक, और जिस लोक में आसन है, वह आदिभौतिक।
प्रश्नोत्तर — माया शक्ति की आगंतुकता पर स्पष्टीकरण
वक्ता ने दोहराया कि भावना का विषय अलग है और प्रमाण का विषय अलग। भावना में गुरु को भगवान कहने से वह व्यक्ति भगवान नहीं हो जाता, क्योंकि भगवान सर्वश्रेष्ठ हैं और वे ही मानक हैं। यह विषय संवेदनशील है, इसे भावना तक सीमित रखें। चर्चा का विषय या प्रमाण का विषय बनाने से रसाभास होता है। माया शक्ति पर प्रश्न उठा कि भगवान में सभी गुण स्वाभाविक होते हैं, लेकिन 'उन्मादकारी माया स्वाभाविक शक्ति नहीं, आगंतुक है' ऐसा कल के श्लोक में आया था। वक्ता ने स्पष्ट किया कि जन्मद करी माया का काम तभी है जब जन हों, अन्यथा उसका काम नहीं है। यह आगंतुक है क्योंकि जब जन नहीं होंगे तो माया का कार्य भी नहीं होगा।
प्रश्नोत्तर — आत्मरमण के समय सृष्टि की नित्यता
प्रभु आत्मरमण कर रहे थे, और अब एक से दो होने की इच्छा हुई। सृष्टि के पूर्व की चर्चा चल रही है, पर व्यापी वैकुंठ में भक्त पहले से ही हैं। क्या यह पूर्व सृष्टि का कंटिन्यूशन है? वक्ता ने समझाया कि भगवत् लोक में प्रभु विराजमान हैं, तो लोक खाली नहीं होगा। प्रतिक्षण अनंत ब्रह्मांड की सृष्टि होती रहती है, अनंत ब्रह्मा प्रकट होते रहते हैं, और अनंत सृष्टियों का लय भी होता रहता है। यह प्रक्रिया निरंतर है। यह एक सृष्टि का वर्णन है, जिसका मतलब यह नहीं कि नित्य सिद्ध भक्त वहाँ न हों। अक्षर का स्वरूप ऐसा है कि आदिदैविक स्तर पर जो है, उसका आदिभौतिक स्तर पर हो रहे से कोई लेना-देना नहीं है। आत्मरमण के समय भी सृष्टि अंदर स्थित रहती है। अनंत प्रकार की सृष्टियों में से यह एक प्रकार वर्णित है, और उसमें प्रभु अपने नित्य लीला धाम में परिकर के साथ विराजमान हैं।