मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भ में किए गए मंगलाचरण को दर्शाता है। मंगलाचरण में वक्ता द्वारा विविध स्तोत्रों और प्रार्थनाओं का पाठ किया गया। यह आध्यात्मिक प्रवचन की परम्परा के अनुसार सत्र की शुरुआत का सूचक है।
श्लोक १७ — ब्रह्माजी की भावदशा
पिछले श्लोकों के संदर्भ में ब्रह्माजी ने भगवान के धाम और उनके स्वरूप का दर्शन किया। इन दर्शनों से ब्रह्माजी का हृदय हर्ष से मगन हो गया, शरीर में रोमांच हो गया और प्रेमप्रवाह के अश्रुओं से नेत्र भर गए। ऐसी अवस्था में उन्होंने भगवान के चरणकमलों में प्रणाम किया। भगवान के इस स्वरूप के दर्शन से ब्रह्माजी के विश्व रचना के सब संदेह दूर हो गए और उन्हें आनंद एवं संतोष की प्राप्ति हुई। कामना की सिद्धि होने पर हृदय आनंद से परिपुप्त हो गया और उन्हें कुछ बोलने का सामर्थ्य भी न रहा। प्रेम का भार बढ़ने से नेत्रों से अश्रू निकल पड़े, जो ज्ञानोत्पत्ति में सहायक थे।
प्रश्नोत्तर — ब्रह्माजी को सायुज्य का अभाव
एक जिज्ञासा उठी कि ब्रह्माजी को सायुज्य मुक्ति क्यों नहीं प्राप्त हुई। इसका समाधान यह बताया गया कि भगवान ने उन्हें विश्व रचना के लिए उत्पन्न किया है और उनसे कार्य करवाना था, इसलिए उन्हें सायुज्य नहीं दिया गया। परमहंसों का मार्ग त्याग का है और वे विश्व को त्यागना चाहते हैं, जबकि ब्रह्माजी विश्व का ग्रहण कर विश्व रचना करना चाहते थे। अतः उनके मार्ग में भिन्नता होने के कारण उन्हें भगवत्साक्षात्कार होने पर भी सायुज्य प्राप्त नहीं हुआ। एक अन्य जिज्ञासा में प्रेम के भार से पसीना आने और अश्रु शब्द के प्रयोग पर चर्चा हुई, जिसमें अश्रु का स्वभाव सर्वदा आने का नहीं होता और यह प्रेम के अतिरेक को दर्शाता है।
श्लोक १८-१९ — भगवदाज्ञा और विश्वरचना
ब्रह्माजी भगवान के दर्शन पाकर प्रसन्न और प्रजा का निर्माण करने के लिए तैयार थे। ऐसे समय में सर्वप्रिय भगवान ने ब्रह्माजी के हाथ का स्पर्श करते हुए कुछ हंसने से प्रकाश वाली वाणी से कहा। भगवान ने ब्रह्माजी से कहा कि तुमने मुझे विश्व रचना की इच्छा प्रकट करके और चिरकाल तपस्या करने से प्रसिद्ध कर लिया है। जो कूटयोगी उपाय चतुर नहीं होते, वे मुझे स्वाभाविक संतोष नहीं पहुंचा सकते। कार्य संपादन में साधन, फल और प्रकार की अपेक्षा रहती है। भगवान ने विश्व रचना के साधन अपने स्वरूप में दिखा दिए थे, अब प्रकार बाकी था। भगवान चाहते थे कि विश्व रचना का प्रकार उनकी इच्छा के अनुसार हो, इसलिए उन्होंने ब्रह्माजी को उत्साह दिलाने के लिए भाषण किया।
प्रश्नोत्तर — मंद हास का रहस्य
यहां शंका उठाई गई कि यदि ब्रह्माजी को भगवान के प्रवचन से वास्तविक तत्वज्ञान हो जाता, तो वे वैराग्य को प्राप्त होकर विश्व रचना का कार्य शिथिल कर देते। इसके समाधान में बताया गया कि भगवान ने अपने भाषण में मंद हास को साथ रखा। भगवान की मुस्कान माया का मोह है, और यह कुछ मोह उत्पन्न करने वाली थी, जिससे ब्रह्माजी को पूर्ण तत्वज्ञान होकर वैराग्य न हो पाए। ब्रह्माजी को ज्ञान तो हुआ, पर वह फलपर्यंत नहीं पहुंचा अर्थात् उन्हें मोक्ष रूप फल की प्राप्ति नहीं हुई। इससे उन्हें सर्वज्ञता और अलौकिक तेज तो मिला, जो सृष्टि निर्माण में सहायक था, परन्तु मोह अल्प रहा और पूर्ण ज्ञान मोक्ष तक नहीं ले गया।
प्रश्नोत्तर — 'अवस्थित' का भाव
एक जिज्ञासा यह थी कि ब्रह्माजी स्वस्थ होकर बैठे थे, जबकि सामान्यतः प्रभु के सम्मुख खड़े रहते हैं। इसका समाधान यह दिया गया कि ब्रह्माजी हजारों वर्षों तक तपस्या कर रहे थे, और तपस्या करते हुए ही उन्हें दर्शन प्राप्त हुए। 'अवस्थित' शब्द का अर्थ आलती-पालती लगाकर बैठा हुआ होना भी हो सकता है, और यह भी कि वे विश्व रचना करने के लिए तैयार बैठे थे। भगवान के दर्शन से तप का श्रम कुछ भी नहीं रहा, और वे शारीरिक कष्टों से रहित होकर स्वस्थ और प्रसन्न मुद्रा में बैठे थे, जो सृष्टि कार्य के लिए उनकी तत्परता को दर्शाता है।