मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भिक मंगलाचरण के लिए है। इसमें वक्ता द्वारा श्रीवल्लभाचार्यजी, श्रीगुरुवे नमः आदि वन्दना की गई है। इस मंगलाचरण का उद्देश्य सत्र के सफल संचालन और श्रोताओं के कल्याण की प्रार्थना करना है। इसमें किसी ग्रन्थ के श्लोक की व्याख्या नहीं की गई है।
सुबोधिनी संदर्भ: द्वितीय स्कंध, नवम अध्याय का मनन
सुबोधिनीजी के प्रथम स्कंध, स्कंधाधिकार लीला का अवगाहन पूर्ण हो चुका है। वर्तमान में द्वितीय स्कंध, साधन ज्ञान लीला का अवगाहन चल रहा है, जिसमें तीन प्रकरण हैं: तत्वन, रत्साद और मनन या विमर्श। मनन दो प्रकार से किया जा रहा है: उत्पत्ति से और उपपत्ति से। उत्पत्ति से मनन पूर्ण हो चुका है, जिसमें अंतर्यामी के प्राकट्य और पुरुषसूक्त में विराट देह का वर्णन आया। अब उपपत्ति से मनन चल रहा है, जिसमें अध्याय आठ में परीक्षित के प्रश्न और अध्याय नौ में सुखदेवजी के उत्तर की चर्चा है। ब्रह्माजी ने सृष्टि रचना की इच्छा की, तप किया और भगवान ने प्रसन्न होकर व्यापी बैकुंठ धाम के दर्शन कराए। भगवान ने ब्रह्माजी के हृदय में प्रेम प्रवाह देखकर उनके हाथ का स्पर्श किया और वाणी से संबोधित किया।
श्लोक १९ — भगवान का ब्रह्मा को प्रसन्नता व्यक्त करना
भगवान ने ब्रह्माजी का स्पर्श करके उन्हें क्रियाशक्ति प्रदान की, और अब ज्ञानशक्ति अपनी वाणी से प्रदान कर रहे हैं। श्लोक १९ का श्लोकार्थ है कि, हे अंतर्ज्ञान संपन्न ब्रह्मा! तुमने विश्व रचना की इच्छा प्रकट करके और चिरकाल तपस्या करने से मुझे प्रसन्न कर लिया है। जो कूटयोगी उपाय चतुर नहीं होते, वे मुझे स्वाभाविक संतोष नहीं पहुँचा सकते। आभासार्थ में बताया गया है कि मन कार्य करने में स्वतंत्र नहीं होता, किंतु वाणी बाहर का कार्य कर सकती है, इसलिए भगवान अपनी वाणी से निरूपण कर रहे हैं। ब्रह्माजी ने विश्व रचना के लिए तप किया था, वर मांगने के लिए नहीं, फिर भी भगवान ने वरदान दिया क्योंकि वे ब्रह्माजी के तप से प्रसन्न हुए।
भगवत्कार्य करने वाले उत्तम सेवक का स्वरूप
पुराणादि सृष्टि शास्त्रों का मुख्य सिद्धांत है कि जो अपने संपूर्ण प्रयत्न से भगवान की इच्छा के अनुसार कार्य करें, वही भगवान के यहाँ प्रथम प्रधान पुरुष या उत्तम पुरुष समझा जाता है। जो भगवान की प्रसन्नता के लिए भगवत्सेवा करता है, वह मध्यम पुरुष है, और जो अपने स्वार्थ के लिए भगवान की सेवा करता है, वह अधम है। ब्रह्माजी ने प्रथम पक्ष का स्वीकार किया, इसलिए भगवान उन पर अति प्रसन्न हुए। वक्ता ने 'उत्तम चिंतितम कुर्यात प्रोक्तकारी तू मध्यम अधमो अश्रद्धया कुर्वन कर्तो चरितंम पितो ये' और भागवत के एकादश स्कंध से 'पुरुष साक्षात आत्म प्रभावं ईश्वरम न भजें वाजंती वा वजा नती स्थानाद भ्रष्टा पतध' जैसे श्लोकों का उद्धरण दिया। भगवान ने ब्रह्मा के हृदय में वेदों को पहुँचा दिया है, जिससे ब्रह्मा को भगवत्कार्य करने का सिद्धांत ज्ञात हुआ। विश्व रचना भगवत् कार्य है, व्यक्तिगत पुत्रोत्पादन स्वार्थ की सेवा नहीं।
प्रश्नोत्तर — भगवत् आज्ञा और भगवत् कर्तव्य का स्वरूप
प्रश्नोत्तर में उत्तम सेवक के संदर्भ में चर्चा हुई। यह समझाया गया कि जिनको भगवत् आज्ञा स्पष्टतया परंपरागत या प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त है, उनके लिए यह उत्तम पक्ष लागू होता है। जैसे अर्जुन को भगवान ने भूभार हरण के लिए प्रेरित किया था, या श्रीमहाप्रभुजी को त्रिविध आज्ञा हुई। शास्त्र आज्ञा भी भगवत् आज्ञा ही है, जैसे 'जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिः ऋणवा जायते' (प्रत्येक ब्राह्मण तीन ऋणों के साथ जन्म लेता है)। देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से मुक्ति के लिए देव पूजा, प्रजोत्पादन, श्राद्ध तर्पण और वेदाध्ययन तथा वेद का दान आवश्यक है। जो कार्य स्वभावतः प्राप्त है, उसका विधान वेद में करने का तात्पर्य उसका अपूर्व प्रामाण्य स्थापित करना है। अन्यथा वेद 'अनुवादकत्व' होकर अप्रमाण हो जाते, क्योंकि लोकिक बातें स्वतः सिद्ध होती हैं।
भगवत् कर्तव्य बनाम भगवत्सेवा
भगवान ब्रह्माजी से कहते हैं कि विश्व रचना करने की इच्छा से मैं प्रसन्न हूँ, और इस पर तुमने जो तप रूप महान क्लेश सहा, उससे मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूँ। भगवान के संतोष के दो कारण बताए गए: विश्व रचना की इच्छा और बहुत काल तक तपस्या। इसमें विश्व रचना की इच्छा मुख्य कारण है, क्योंकि तप तभी प्रभावी होता है जब वह भगवत् इच्छा से जुड़ा हो। यदि भगवत् कर्तव्य प्राप्त है और उसके लिए अवकाश भी है, तो उसका पालन करना ही उत्तम है। यदि परिस्थिति ऐसी न हो कि कर्तव्य का पालन हो सके, तब भगवत्सेवा ही मुख्य कर्तव्य बन जाती है। वैद्य जैसे अपनी शपथ के कारण मरीज को मना नहीं कर सकता, वैसे ही भगवत् कर्तव्य को प्राथमिकता देनी चाहिए। तप की व्याख्या में इंद्रियों और बुद्धियों को संताप के द्वारा नियमित करना बताया गया। अभ्यास से क्लेश कम हो सकता है, परंतु देखने वाले के लिए यह क्लेशदायक ही प्रतीत होता है।
प्रश्नोत्तर — तप का स्वरूप और योगी का भगवत् कार्य
प्रश्नोत्तर में वक्ता ने तप के स्वरूप पर विस्तार से चर्चा की। वक्ता ने कहा कि भगवान को ब्रह्मा के तप से क्लेश की अनुभूति लोकदृष्टि से होती है, क्योंकि इतना लंबा समय एकाग्र होकर रहना औरों के लिए क्लेशदायक होता है। तप को इंद्रियों और बुद्धियों को संताप द्वारा नियमित करना बताया। योगी जन के भगवत् कार्य पर भी चर्चा हुई। यह समझाया गया कि भगवत् कार्य एक विशिष्ट पद है। यदि ब्रह्मा को सृष्टि रचना के लिए नियुक्त किया गया है, तो उनका भगवत् कार्य सृष्टि रचना ही है। ऐसे में यदि वे योग साधने बैठ जाएँ, तो वह 'निकम्मापन' माना जाएगा। योग अष्टांग में यम और नियम तप के ही स्वरूप हैं, जो मन और इंद्रियों को कुपथ से बचाते हैं। तप का मुख्य अर्थ 'विचार पूर्वकम् आलोचनम् तपः' अर्थात् चिंतन भी है। भगवान ने गीता में कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकार के तप बताए हैं। यदि योग भगवत् चिंतन पूर्वक हो, तो वह 'तप सहित योग' हो जाता है और अन्यथा तप रहित शून्य होता है।