द्वितीय स्कंध: स्वरूप तथा प्रकरणों का निरूपण
वक्ता ने श्रीमद्भागवत महापुराण के १२ स्कंधों की आनंद रूप हरि की आनंद रूप लीला का परिचय दिया। द्वितीय स्कंध को ज्ञान लीला कहा गया है जिसमें तीन प्रकरण हैं। प्रथम प्रकरण में साधन तत्व ज्ञान, स्थूल ध्यान और सूक्ष्म ज्ञान का निरूपण है। द्वितीय प्रकरण में रथ प्रसाद व श्रद्धा, जिसमें श्रोता और वक्ता के रथ प्रसाद का वर्णन है। वर्तमान में तृतीय प्रकरण चल रहा है जिसमें साधन मनन और विमर्श का निरूपण है, जिसमें अध्याय पाँच से सात में उत्पत्ति और अध्याय आठ से दस में उत्पत्ति का निरूपण है, विशेषकर अध्याय नवें में जीव और ब्रह्म विषयक संदेह का निवारण तथा चतुःश्लोकी भागवत का निरूपण हो रहा है। उन्होंने पिछले श्लोक (१९वें) का संक्षिप्त सार भी दिया, जिसमें ब्रह्माजी के हृदय में भगवान के दर्शन से उत्पन्न हर्ष और रोमांच का वर्णन था, जिसके पश्चात् भगवान ने ब्रह्माजी को विश्व रचना की आज्ञा दी।
श्लोक २० — भगवान द्वारा वरदान के लिए प्रेरणा
श्लोक २० के आभासार्थ में भगवान ब्रह्माजी को वर मांगने के लिए प्रेरित करते हैं। वे कहते हैं, 'हे ब्राह्मण, मैं सब पुरुषार्थ को देने वाला हूँ, इसलिए जो तुम्हारी इच्छा में आवे वैसा वर मांग लो, तुम्हारा श्रेय होगा।' यह आश्वासन दिया गया कि कामना करने से उनका नाश नहीं होगा, बल्कि कल्याण ही होगा। इस पर चर्चा हुई कि वर की इच्छा से कार्य करते रहना चाहिए और अपनी इच्छा का पदार्थ मांगने से नाश होने की शंका नहीं करनी चाहिए। भगवान ने यह भी स्पष्ट किया कि वे जानते हैं कि ब्रह्माजी इस वर का उपयोग भगवत्कार्य, यानी सृष्टि रचना, में ही करेंगे। उन्होंने अन्य देवगणों द्वारा दिए गए वरदानों को 'वराभास' बताया, क्योंकि वे इच्छा पूर्ति नहीं करते और सुख-दुख मिश्रित होते हैं, जबकि भगवान के वर वास्तव में श्रेष्ठ होते हैं। ब्रह्माजी के प्रश्न पर कि यदि तप से ही सब सिद्ध होता है तो वरदान की क्या आवश्यकता, भगवान ने उत्तर दिया कि मेरे दर्शन होने के बाद सब परिश्रम दूर हो जाता है और कोई कल्याण शेष नहीं रहता। वक्ता ने 'पुरुषोत्तम दर्शन' और 'अवतार दर्शन' में भेद बताया, यह स्पष्ट करते हुए कि पुरुषोत्तम के दर्शन होने पर ही जीव को परिश्रम नहीं करना पड़ता।
श्लोक २१ — तप और भगवदिच्छा का संयुक्त प्रभाव
श्लोक २१ में भगवान ब्रह्माजी से कहते हैं, 'मेरी आज्ञा को सुनकर जो तुमने एकांत में बैठकर परम तपस्या की और फिर जो मेरे लोक व्यापी वैकुंठ का दर्शन किया, यह सब मेरी इच्छा का ही प्रभाव है।' यह आशंका उठाई गई कि यदि परिश्रम से इच्छित पदार्थ की प्राप्ति हो सकती है, तो भगवान से वर मांगने की क्या आवश्यकता। भगवान ने स्पष्ट किया कि ब्रह्माजी का तप और वैकुंठ का दर्शन, दोनों मेरी इच्छा से ही हुए हैं। वक्ता ने इस सिद्धांत पर जोर दिया कि भगवान की इच्छा के बिना अक्षर ब्रह्मात्मक लोक का दर्शन असंभव है, भले ही हजार उपाय किए जाएं। उन्होंने कठोपनिषद के वेद वाक्य 'पराची खानी' का उदाहरण दिया कि इंद्रियां बाह्य पदार्थों को ही देख पाती हैं, अंतरात्मा में आए पदार्थों को नहीं। सामर्थ्य भी अक्षर ब्रह्मस्थ पदार्थों का दर्शन नहीं करा सकता, केवल भगवदिच्छा से ही यह संभव है। तप और इच्छा, दोनों भगवान की शक्तियां होते हुए भी इच्छाशक्ति को सर्वोत्कृष्ट बताया गया, जिसके अधीन अन्य सभी शक्तियां कार्य करती हैं। तप का करना और लोकदर्शन, दोनों भगवान की इच्छा का ही प्रभाव थे, तपस्या केवल उस इच्छा को पैदा करने का एक साधन थी। ब्रह्माजी ने एकांत में तप किया ताकि वह स्थिर रहे और अभिमान से रहित हो।
श्लोक २२ — तपः मेरा हृदय है
श्लोक २२ का आभासार्थ यह है कि ब्रह्माजी के मन में यह विचार आ सकता है कि मैंने तपस्या की, जिससे मुझे भगवान के लोक के दर्शन हुए, तो मैं अपने परिश्रम से ही सब कुछ प्राप्त कर सकता हूँ। इस आशंका का निवारण करते हुए भगवान कहते हैं, 'तपः मेरा हृदय है और तप का आत्मा भी मैं हूँ।' अर्थात्, जो तपस्या तुमने की, वह वस्तुतः मेरा ही स्वरूप है। वक्ता ने समझाया कि भगवान ने ब्रह्माजी को तप करने की आज्ञा दी थी, जिससे तप में भगवान का सामर्थ्य प्रकट हो गया। भगवान ने कहा कि तप मेरा ही रूपांतर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान का स्वरूप क्रिया (तप) के द्वारा प्रकाश में आता है और कुछ स्वरूप ज्ञान के द्वारा प्रकाश में आता है। क्रिया द्वारा प्रकाशित स्वरूप बाह्य सामर्थ्य सूचक है, जबकि ज्ञान द्वारा प्रकाशित स्वरूप आंतरिक, नित्य और भक्ति द्वारा हृदय में प्रकाशित होता है। भगवान ब्रह्माजी को समझाते हैं कि तप और मेरे धर्मी स्वरूप में कोई भेद नहीं है, वे अभेद हैं, अतः व्यर्थ का तर्क नहीं करना चाहिए।
श्लोक २३ — तपः मेरा पर पराक्रम है
श्लोक २३ में भगवान कहते हैं, 'मैं तप से सब जगत को सजता हूँ, फिर तप से रक्षण करता हूँ और तप से ही इसका प्रलय करता हूँ। इसलिए यह तप मेरा दूस पराक्रम है।' इस पर आशंका उठाई गई कि क्या तप का सामर्थ्य भगवान के बराबर हो सकता है, और क्या तप भी विश्व रचना कर सकता है। वक्ता ने इस आशंका का समाधान करते हुए समझाया कि यद्यपि सृष्टि रचना में तप करण (साधन) है, तथापि करणादि कारक भी अपने व्यापार में कर्ता हो जाते हैं। इस नियम से तप कर्ता भी है। ऐसी अवस्था में भगवान और तप दोनों समान हो जाते हैं, अर्थात् उनमें अभेद समझना चाहिए। भगवान स्पष्ट करते हैं कि तप तो मेरा पराक्रम रूप धर्म है; मेरा धर्म ही कहीं-कहीं धर्मी हो जाता है। भगवान धर्मी हैं और तप उनका धर्म। धर्मों के रहते हुए भी प्रेरणाकर्ता की अपेक्षा रहती है। इस प्रकार, तप भगवान का ही रूपांतर है और क्रिया के द्वारा प्रकाशित होता है।