यह अध्याय श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वितीय स्कन्ध के नवम अध्याय पर आधारित है। इसमें महाप्रभुजी द्वारा प्रकृति श्रीसुबोधिनीजी के प्रथम स्कन्ध अधिकार लीला और द्वितीय स्कन्ध साधन ज्ञान लीला का अवगाहन किया जा रहा है। साधन ज्ञान लीला के तीन प्रकरण हैं: तत्त्वन, रत्साद् और मनन (विमर्श)। वर्तमान में मनन प्रकरण चल रहा है, जो उत्पत्ति और उपपत्ति दो प्रकार से किया जाता है। उत्पत्ति से मनन हम देख चुके हैं, जिसमें अंतर्यामी के प्राकट्य और पुरुषसूक्त में विराट देह का वर्णन तथा अंतर्यामी भगवान के अवतारों की कथा आई। अब उपपत्ति से मनन चल रहा है, जिसमें अध्याय आठ में राजा परीक्षित द्वारा आक्षेपगर्भित प्रश्न पूछे गए थे, जैसे जीव और देह का संबंध कैसे हुआ और भगवान ने ब्रह्माण्डरूपी देह कैसे धारण किया। इन प्रश्नों का उत्तर अध्याय नौ में दिया जा रहा है। अध्याय आठ में आशंका, अध्याय नौ में उत्तर, और अध्याय दस में फल का निरूपण है। वर्तमान में अध्याय नौ में परीक्षित के प्रथम प्रश्न का उत्तर दिया जा चुका है कि जीव को माया के कारण देह का संबंध होता है। अब दूसरे प्रश्न के उत्तर पर मनन चल रहा है। ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की इच्छा की, कोई उपाय न सूझने पर तप करके 'तप' शब्द सुना, जिससे उन्हें तप करने की आज्ञा मिली। उन्होंने निश्चल स्थिति में बैठकर प्राण, मन, ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को वश में करके दिव्य हजारों वर्षों तक तप किया। इस तप से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और अपने व्यापी वैकुंठधाम (अक्षरधाम) के भी दर्शन कराए। इस धाम में न माया है और न काल का पराक्रम चलता है, सब कुछ भगवत्स्वरूप और भगवत्इक्षित है। ब्रह्माजी ने उस वैकुंठधाम और उसमें कमल रूपी आसन पर विराजमान भगवान के दर्शन किए, जिससे वे अति प्रसन्न हुए, रोमांच से भर गए और प्रेमप्रवाह में उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। इस अवस्था में वे भगवान के चरणकमलों को प्रणाम करके कुछ भी बोल न सके। तब भगवान ने ब्रह्माजी के हाथ का स्पर्श किया और मंद हास के साथ प्रकाश वाली वाणी से बोले। श्लोक १८ तक यह देखा गया। अब श्लोक १९ से भगवान की वाणी को देखेंगे। भगवान ने ब्रह्माजी को क्रियाशक्ति प्रदान की थी और अब ज्ञानशक्ति अपनी वाणी से प्रदान करेंगे। श्लोक १९ का श्लोकार्थ है: 'हे अंतर्ज्ञान संपन्न, तुमने मुझे विश्व रचना करने की इच्छा प्रकट करके और चिरकाल तपस्या करने से प्रसन्न कर लिया है। जो कूटयोगी उपाय चतुर नहीं होते, वे मुझे स्वाभाविक संतोष नहीं पहुँचा सकते।' इसका आभासार्थ है कि मन कार्य करने में स्वतंत्र नहीं होता, किंतु वाणी बाहर का कार्य कर सकती है। इसलिए भगवान अपनी वाणी का निरूपण करते हैं।
सुबोधिनीजी में शंका उठाई गई कि ब्रह्माजी ने तो विश्व रचना के लिए तप किया था, वर मांगने के लिए नहीं, फिर भी भगवान ने वरदान दिया, इसका क्या कारण? इसका उत्तर दिया गया कि 'त्वया अहम तोषितः' — तुमने मुझे प्रसन्न किया है, तुमने जो सृष्टि रचना की इच्छा की और तप किया, उसी से मैं प्रसन्न हो गया हूँ। पुराणादि सृष्टि शास्त्रों का मुख्य सिद्धांत है कि जो अपने संपूर्ण प्रयत्न से भगवान की इच्छा के अनुसार कार्य करें, वही भगवान के यहाँ प्रथम प्रधान पुरुष (उत्तम पुरुष) समझा जाता है। जो भगवान की प्रसन्नता के लिए भगवत्सेवा करता है, वह मध्यम पुरुष है। और जो अपने स्वार्थ के लिए भगवान की सेवा करता है, वह अधम है। ब्रह्मा ने प्रथम पक्ष का स्वीकार किया, इसलिए भगवान उन पर अति प्रसन्न हुए। तीनों ही भगवान की सेवा करते हैं, तथापि भगवत्चिंतित कार्य में सहायक होकर पूर्ण प्रयत्न से भगवत्इच्छा अनुसार कार्य करने वाला सेवकों में उत्तम है। लोक और शास्त्र में भी यही सिद्धांत स्वीकृत है। नीतिशास्त्र से वचन: 'उत्तमं चिंतितं कुर्यात, प्रोक्तकारी तु मध्यमः, अधमोंऽश्रद्धया कुर्वन्नकर्तो चरिंतम् पितुः।' अर्थात्, पिता का इक्षित कार्य करने वाला उत्तम, कहने पर करने वाला मध्यम, अश्रद्धा से करने वाला अधम, और न करने वाला तो मूत्र की तरह त्याज्य है। ब्रह्म भी भगवान का आत्मज (पुत्र) है, अतः ब्रह्मा को आत्मभू कहते हैं। भगवान के हृदय में सृष्टि रचना की इच्छा थी, तदनुसार विश्व रचना करने की इच्छा ब्रह्मा के मन में भी हुई। इसके लिए ब्रह्मा ने संपूर्ण प्रयत्न से चिरकाल पर्यंत दुष्कर तप किया, तब भगवान उन पर अति प्रसन्न हुए। यह ठीक ही है। अतः मूल में 'सम्यक्' कहा है, यानी अच्छी तरह से तुमने मुझे प्रसन्न किया। यहाँ यह विचार होता है कि ब्रह्मा को इस सिद्धांत का प्रकाश कैसे हुआ? इसके उत्तर में कहते हैं कि 'वेदगर्भ' — भगवान ने पहले ही ब्रह्मा के हृदय में वेदों को पहुँचा दिया है। ब्रह्मा के गर्भ में वेद भरे हैं और वेदों का सिद्धांत है कि सृष्टि के सभी समझदार पुरुषों का कर्तव्य है कि वे भगवत्कार्य करें। विश्व रचना करना इस समय भगवान का कार्य है, उसी को ब्रह्मा भी करना चाहते हैं, यही बात वेदों में कही गई है।
यहाँ 'प्रजापति अकामयात', 'प्रजापति ने चाहा कि मैं प्रजा की रचना करूं', और 'ऋतुओं की अभिमानी देवता ने प्रजा की चाहना की' जैसे श्रुति वचनों का उल्लेख है, जो विश्व रचना की ही चर्चा करते हैं। यहाँ स्पष्ट किया गया कि यह भगवत्इक्षित कार्य की इच्छा है, व्यक्तिगत पुत्रोत्पादन स्वार्थ की नहीं। व्यक्तिगत पुत्रोत्पादन स्वार्थ सेवा है, जबकि विश्व रचना भगवत्कार्य है। कितने ही मीमांसक 'रेतः सिंचति' जैसे श्लिष्ट शब्द को देखकर उन श्रुतियों का अर्थ लौकिक पुत्रोत्पादन में ले जाते हैं, यह उनका भ्रम है। यदि ये श्रुतियाँ लौकिक बात को ही कहतीं, तो अनुवाद हो जाने से अप्रमाण हो जातीं। अनुवाद में स्वतंत्र प्रामाण्य नहीं होता। 'वेदगर्भ' शब्द का तात्पर्य यह है कि जो लोग ऊपरी तौर पर वेदों को जानते हैं, वे उनके अंतरवर्ती आशय को नहीं जानते, उनका सिद्धांत ग्राह्य नहीं है। ब्रह्मा को ही वेदों का स्थिर ज्ञान है। तदन्य पुरुषों की बुद्धि में जो वेद ज्ञान आया है, वह अनित्य है। पूर्वोक्त सिद्धांत ब्रह्मा पुराणों से पुष्ट हुआ है, वह निर्बल नहीं है। यदि वेद में कहा जाए कि 'तुम खाओ, सांस लो, सो जाओ', तो उसका प्रामाण्य कैसे सोचा जा सकता है, क्योंकि ये कर्म स्वभावतः प्राप्त हैं। जो कर्म स्वभावतः प्राप्त हैं, उनका विधान करने का कोई मतलब नहीं है। इसलिए, यदि ये वचन लौकिक प्रजोत्पत्ति की बात करते तो 'अनुवादकत्व' दोष के कारण अप्रमाणिक हो जाते। वेद स्वतंत्र प्रमाण हैं, उनका प्रामाण्य 'अपूर्व आज्ञा' के रूप में होता है। इसलिए, ये सभी श्रुति वचन भगवत्इच्छा जो कार्य करने की है, उसी के संबंध में निरूपण हैं और ब्रह्माजी ने यही तात्पर्य समझा। जिन व्यक्तियों को भगवतकार्य की स्पष्ट आज्ञा प्राप्त है, उन्हें उसका पालन करना चाहिए। जैसे श्रीमहाप्रभुजी को भगवत्आज्ञा हुई थी भक्ति प्रचार की, और उन्होंने गृहस्थ आश्रम अंगीकार कर अपने वंश द्वारा इस कार्य को जारी रखने की इच्छा की। जहाँ प्रत्यक्ष आज्ञा नहीं है, वहाँ 'श्रुति स्मृति मम वाक्य' वचन से श्रुति और स्मृति को भगवान की आज्ञा मानकर यथाधिकार उसका पालन करना चाहिए। यदि भगवत्कर्तव्य प्राप्त हो और उसका पालन न किया जाए, तो वह अपराधी होता है।
भगवान आज्ञा करते हैं कि हे ब्राह्मण, तुम्हारे हृदय में विश्व रचना करने की इच्छा हुई, बस इतने से ही मैं प्रसन्न हो चुका हूँ। उस पर भी जो तुमने तप रूप महान क्लेश सहा, इससे तो मैं बहुत ही संतुष्ट हुआ हूँ। यह बात 'चिरं व्रतेन तपसा' वाक्य से कही। भगवान को संतोष होने के दो पृथक्-पृथक् कारण कहे गए हैं: पहला विश्व रचना की इच्छा और दूसरा बहुत काल तक तपस्या। इसमें विश्व रचना की इच्छा मुख्य कारण है, क्योंकि यदि ब्रह्मा के हृदय में सृष्टि रचने की इच्छा पैदा न होती, तो केवल तप करने से भगवान प्रसन्न होते या नहीं भी होते। अतः 'शिष्ट रक्षा' वहीं अंग हो जाती। तथापि शिष्ट रक्षा मुख्य तो है ही, इसलिए शिष्ट रक्षा यह हेतु पृथक् कहा। भगवान की आज्ञा के अनुसार कार्य करना ही भगवत्कर्तव्य है। श्रीमहाप्रभुजी के जीवन में भी यही द्वंद्व था जब उन्हें निजधाम पधारने की इच्छा हुई, किंतु भगवत्आज्ञा का पालन करना था। जिनको सानुभाव नहीं है, उनके लिए शास्त्र आज्ञा ही भगवत्आज्ञा का स्वरूप है। हर एक पैदा होने वाला द्विज तीन ऋणों के साथ पैदा होता है - देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। इन ऋणों से मुक्ति के लिए देव पूजा, प्रजोत्पत्ति और श्राद्ध तर्पण, तथा वेदाध्ययन और वेदों को पढ़ाना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति अपना कर्तव्य जानता है और उसके लिए अवकाश भी है, फिर भी वह उसे नहीं करता तो वह अपराधी है। किंतु यदि परिस्थितियाँ ऐसी न हों, जैसे किसी ने वेदाध्ययन कर लिया, पर पढ़ाने के लिए कोई विद्यार्थी न मिले, तो उस पर कोई दोष नहीं। उसी तरह, जिन लोगों के वर्णाश्रम के संस्कार अब नहीं होते, उनका अधिकार निवृत्त हो चुका है। जैसे अग्निहोत्र के लिए तीन पीढ़ी तक की दीक्षा का पुनर्जीवन संभव है, पर यदि कई पीढ़ियाँ बीत चुकी हों, तो अब अग्निहोत्री होना संभव नहीं। इसमें उनका दोष नहीं। तो, जो भगवत्कर्तव्य आपको प्राप्त है, वह करने के लिए यदि अवकाश है और न करो तो अपराधी हो। यदि अवकाश नहीं है, तब भगवत्सेवा ही आपका मुख्य और अंतरंग कर्तव्य बन जाता है। जैसे डॉक्टर को शपथ दिलवाई जाती है कि वह मरीज को इनकार नहीं कर सकता, भले ही सोने का समय हो, क्योंकि मनुष्य के स्वास्थ्य से संबंधित बातें ऐसी हैं कि कोई बहानेबाजी नहीं चलती। इसी तरह, भगवत्कर्तव्य इतना मुख्य है, उसके सामने भगवत्सेवा भी एक और रखी जा सकती है, यदि वह कर्तव्य प्राप्त हो।
यहाँ विश्व रचना करने की इच्छा भगवत्कार्य है, इसलिए जो योगी जन भगवत्कार्य नहीं करते, केवल निराधार श्रम मात्र करते हैं, वे वास्तविक तपस्वी नहीं कहे जा सकते। ब्रह्मा को भगवान ने सृष्टि रचना के लिए नियुक्त किया था, तो सृष्टि रचना करना भगवत्कार्य हुआ। ऐसे में ब्रह्मा उस कार्य को छोड़कर योग साधने बैठ जाएँ, तो वह 'निकम्मा' सिद्ध होगा। भगवत्कार्य, भगवत्सेवा और स्वार्थ भगवत्सेवा - ये उत्तरोत्तर अधम बताए गए हैं। यदि किसी को भगवत्आज्ञा है तो उसे भगवत्कार्य करना चाहिए, यदि भगवत्आज्ञा का ज्ञान नहीं है तो भगवत्सेवा करनी चाहिए। योग साधने बैठ जाना तो बिल्कुल निकम्मेपन का प्रदर्शन है। भगवान ने इस सृष्टि में हाथ-पाँव, अक्ल दी, और उन सबका निरुपयोग करना ही योग नहीं है। योगी का मार्ग भले ही अपना हो, पर यदि वह भगवत्कार्य से विमुख होता है तो वह निकम्मा ही है, क्योंकि वह न तो लोगों के काम आएगा, न भगवान के काम आएगा। जीवन भर कुछ भगवत्कार्य न किया हो, न भगवत्सेवा की हो, और मृत्युकाल आ जाए, तब उसे योग के द्वारा अपने को प्रभु से जोड़ने का मार्ग बताया गया है। योग का यह उपयोग सिर्फ मृत्युकाल तक ही सीमित रहेगा। जैसे धृतराष्ट्र आदि को कहा गया कि अब तो अक्ल लाओ। यदि योग तप के साथ है तो ठीक है। वास्तविक में अगर तप होता है योग के साथ, जिस योग में तप न हो, वह शून्य ही है। अष्टांग योग में तप प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहा गया है, पर उसे जोड़ना आवश्यक है। तप के दो अर्थ हैं: एक तो योग के अंदर यम और नियम, जो तप का ही स्वरूप है, जो मन और इंद्रियों को कुपथ से जाने से बचाते हैं, संयम में रखते हैं। दूसरा, तप का मुख्य अर्थ है 'विचारपूर्वकम् आलोचनम् तपः' अर्थात् चिंतन। भगवान ने गीता में तीनों ही प्रकार के तप बताए हैं: कायिक, वाचिक और मानसिक। मानसिक तप इसी रूप में समझना है कि चिंतन आवश्यक है। भगवत्चिंतन पूर्वक यदि योग होता है, तो वह योग तप सहित हो जाएगा और अन्यथा तप रहित होगा।