मंगलाचरण
यह भाग सत्र के मंगलाचरण के लिए आरक्षित है। इसमें धार्मिक स्तुतियाँ और प्रार्थनाएँ सम्मिलित हैं।
श्लोक ३७ : ब्रह्म, परमात्मा और भगवान का स्वरूप
प्रतिभागियों ने श्लोक ३७ में उल्लिखित ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के स्वरूपों में भिन्नता पर प्रश्न उठाया। वक्ता ने बताया कि ब्रह्मा, परमात्मा और भगवान तीन प्रमुख सत्ताएँ हैं। चर्चा में ब्रह्म के आकारित और निराकार रूपों, ईश्वर के धन के स्रोत होने तथा परम आत्मा के संसार की विविधताओं के प्रति सम्मान पर विचार-विमर्श हुआ। वक्ता ने स्पष्ट किया कि ब्रह्म का स्वरूप रूप के सम्मान से उत्पन्न होता है और ईश्वर का सार स्वरूप उसका अपना रूप है। काल को ईश्वर का ही स्वरूप बताया गया है जो सभी का आधार है।
श्लोक ३७ : ब्रह्म और ईश्वर के स्वरूप में भिन्नता
श्लोक ३६ के संदर्भ में ब्रह्म, परमात्मा और ईश्वर के स्वरूपों की समानता और भिन्नता पर विचार किया गया, विशेषकर भगवान के रूप में संसार का चित्रण। इस चर्चा में काल (समय) के विभिन्न प्रभावों और अंतर्मुखी व बहिर्मुखी स्वभावों पर विशेष ध्यान दिया गया। वक्ता ने बताया कि ब्रह्म के दोनों रूप आनंदमय हैं, और आत्मा व ब्रह्म के रूप में संसार को दर्शाया गया है। श्रीमहाप्रभुजी के अनुसार, यह काल, कर्म, प्रकृति आदि का स्वभाव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतर्मुखी आत्मा भय से मुक्त होती है क्योंकि वह सच्चिदानंद स्वरूप को भीतर अनुभव करती है, जबकि बहिर्मुखी जीव संसार में आसक्त होकर काल के भय से ग्रस्त रहते हैं।
श्लोक ३८-३९ : काल के स्वरूप और प्रेरणा का विवेचन
सत्र में तत्वमुक्ति अध्याय के अंतर्गत भक्ति और वैराग्य को योग का उत्कृष्ट उपकरण बताया गया, तथा वैराग्य के कारण के रूप में समय के महत्व पर प्रकाश डाला गया। श्लोक ३८ और ३९ में काल के स्वरूप, उसकी सर्वव्यापकता और प्रेरणादायक गुणों का विवेचन किया गया। काल को सभी प्राणियों का आश्रय, भरण-पोषणकर्ता और अंततः संहारक बताया गया। वक्ता ने समझाया कि काल ही विष्णु स्वरूप है जो यज्ञों का अधिष्ठाता और सभी का आधार है, अंदर और बाहर दोनों जगह विद्यमान है। उन्होंने 'कलयति' शब्द की व्याख्या 'प्रेरित करना' और 'खाना' दोनों अर्थों में की, यह दर्शाते हुए कि काल किस प्रकार सभी भूतों का उपभोग करता है और कर्म तथा ज्ञान के माध्यम से अभिव्यक्त होता है।
श्लोक ४०-४१ : काल के अधिदैविक और आध्यात्मिक स्वरूप
वक्ता ने श्लोक ४० में काल के आध्यात्मिक स्वरूप और श्लोक ४१ में उसके अधिदैविक रूप को समझाया। काल के तीन प्रकार - अधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक - तथा उनके विशिष्ट कार्यों पर चर्चा की गई। वक्ता ने बताया कि काल ही विश्व का स्वामी, सभी की आत्मा, अप्रकट और सभी भूतों का निर्माता भगवान विष्णु है। उन्होंने बल दिया कि काल भगवान का ही एक स्वरूप है जो सभी को वश में करता है और भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को काल के भय से मुक्त रखते हैं। श्रीमहाप्रभुजी के 'काल महिमा' का संदर्भ दिया गया, जहाँ काल के विभिन्न स्वरूपों का विवेचन है, यह बताते हुए कि काल ही भगवान है।
प्रश्नोत्तर : काल के विभिन्न स्वरूपों पर जिज्ञासा
प्रतिभागियों ने काल के अधिदैविक और आध्यात्मिक रूपों के बीच के अंतर पर प्रश्न किया। काल की ब्रह्मा, विष्णु, महेश को प्रेरित करने की शक्ति और भगवान के काल से परे होने पर भी काल के उनके स्वरूप होने की जिज्ञासा उठाई गई। वक्ता ने स्पष्ट किया कि अधिदैविक काल वह है जहाँ सूर्य, इंद्र आदि भयभीत होते हैं और अपने कार्य करते हैं, जबकि आध्यात्मिक काल भगवान के स्वरूप में ही अनुभव होता है। उन्होंने पुरुषोत्तमजी के मत का उल्लेख किया जिसमें काल के चार रूप बताए गए हैं, और समझाया कि काल भगवान की शक्ति का सहायक तत्व है, जो उनसे भिन्न नहीं है और भगवान ही काल के नियंत्रक हैं।
प्रश्नोत्तर : काल की नश्वरता और दोष निवारक स्वरूप
चर्चा में काल के अविनाशी स्वरूप और उसकी नश्वरता के संबंध में प्रश्न उठाए गए, विशेषकर बीज के दृष्टान्त के माध्यम से। काल के विभिन्न दोषों और भगवान के 'कालदोष निवारक' स्वरूप पर भी चर्चा हुई। वक्ता ने स्पष्ट किया कि काल स्वयं नष्ट नहीं होता क्योंकि वह भगवान का स्वरूप है, जो निरंतर सृजन और लय का कार्य करता है। उन्होंने श्रीमद्भागवत (स्कन्ध ११, अध्याय २४, श्लोक २५-२६) के संदर्भ से बताया कि सूर्य, वायु, इंद्र और मृत्यु भी काल के भय से कार्य करते हैं। भगवान का 'कालदोष निवारक' नाम उनके सभी कालिक दोषों को दूर करने की शक्ति को दर्शाता है, क्योंकि वे ही पापों को दूर करते हैं।