द्वितीय स्कंद, अध्याय ९ का संदर्भ
श्रीभागवत सुबोधिनी जी के द्वितीय स्कंद के ज्ञान लीला अंतर्गत प्रकरण एक तत्वज्ञान और प्रकरण दो तत्पश्चात का अवगान करने के बाद प्रकरण तीन मनन यानी कि विमर्श का अवगान किया जा रहा है। इसमें अध्याय पांच, छह, सात, आठ का अवगान कर अब प्रकरण तीन का अध्याय नौ लिया गया है। श्लोक २० में भगवान ब्रह्मा जी को वर मांगने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और श्लोक २१ में भगवान कह रहे हैं कि विश्व संबंधी पदार्थों की उत्पत्ति तप करने से नहीं किंतु मेरी इच्छा से हुई।
श्लोक २२ में ब्रह्मा जी कर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे, तब भगवान ने तप करने की आज्ञा की और उनको दर्शन दिए। यह सब भगवान की इच्छा से हुआ। श्लोक २३ में आशंका उठाई गई कि क्या भगवान के बराबर तप उतना ही सामर्थ्य तप में उतना सामर्थ्य है। महाप्रभुजी सुबोधिनी जी में आशंकाएं उठाकर भागवत के मूल श्लोकों के विषय को समझाते हैं जिससे सिद्धांत दृढ़ हो जाता है। भगवान की क्रिया शक्ति हो या ज्ञान शक्ति, दोनों में ही साक्षात भगवान ही विराजमान हैं। ब्रह्मा जी को कहा कि मेरे में और मेरे साधन में कोई भेद नहीं है और इस विषय में ज्यादा सोचना उचित नहीं है।
श्लोक २४ का पारायण एवं श्लोकार्थ
ब्रह्मा जी ने श्लोक २४, २५, २६, २७ और २८ का पारायण किया। श्लोक २४ का श्लोकार्थ प्रस्तुत करते हुए ब्रह्मा जी भगवान से कहते हैं कि हे भगवान, आप सब प्राणियों के अध्यक्ष और प्रत्येक के हृदय आकाश में विराजमान हैं। अतः मेरे कर्तव्य की इच्छा को आप अपने अनिवार्य विज्ञान के द्वारा जान ही रहे हैं। ब्रह्मा जी यहां भगवान की सर्वज्ञता और अन्तर्यामी स्वरूप को स्वीकार करते हैं।
श्लोक २४ की सुबोधिनी व्याख्या
सुबोधिनी जी में बताया गया है कि ब्रह्मा ने चार पदार्थ चाहे हैं, उनमें से पहली प्रार्थना दोष दूर करने की विषय की है। ब्रह्मा जी ने 'भगवन' संबोधन का प्रयोग कर यह स्पष्ट किया कि वे भगवान के इस समय के ऐश्वर्य आदि युक्त स्वरूप को समझ गए हैं। वे सबके आंतरिक आत्मा और हृदय की बातों को जानते हैं, इसलिए उनके मनोरथ को भी जानते हैं। वे मानते हैं कि यह बात दोहराना पीसे हुए को पीसना मात्र है, पर यदि भगवान की इच्छा हो तो वे मांगेंगे।
ब्रह्मा जी यह भी स्वीकार करते हैं कि उनके हृदय में उत्पन्न कामना भगवान ने ही पैदा की है और अब उसकी पूर्ति भी भगवान ही करेंगे, क्योंकि वे अपने पुत्रों का भरण-पोषण सब कोई करता है। भगवान सबके हृदय आकाश में अपने स्वरूप से भरकर बैठे हैं, इसलिए सबकी इच्छाएं और कर्तव्य जानते हैं। उनका ज्ञान सर्वोत्कृष्ट है, कालादि से न रोका जा सके ऐसा है। कार्य को समझने और करने के समय तथा उसके सर्वांशों तक पहुँचने में भी किसी अंश में भी आपके ज्ञान की कोई भी रुकावट नहीं कर सकता। सबकी इच्छाओं को आप ही पैदा करते हैं और जहां इच्छाएं पैदा होती हैं, उसी स्थान पर विराजमान रहते हो। अतः आपका सब कुछ जाना हुआ है, इसलिए ना तो आपको कुछ पूछने योग्य है और ना मुझे कुछ कहने योग्य है।
प्रश्नोत्तर — कामनाओं का प्रेरक कौन?
एक सहभागी ने प्रश्न किया कि क्या जीव को होने वाली सभी कामनाओं, विशेषकर दूषित भावों के प्रेरक भगवान ही हैं। ऐसे में आत्मग्लानि होने पर उसे कैसे समझना चाहिए। वक्ता ने गीता के श्लोक "सुखम दुखं भव भावो भयं चा भयवच अहिंसा समता तृष्टि ही तपोदानं यशो यश। भवनती भाव भूताना मत विधा।" का उल्लेख करते हुए समझाया कि सभी प्रकार के भावों को प्रकट करने वाले भगवान ही हैं।
यदि हमारा यह दृष्टिकोण रहता है कि यह भगवत्प्रेरणा से ही हुआ है, और इस विषय में हमारी कंसिस्टेंसी हो, तब तो लीलात्मकता हमें समझ में आ रही है और हम अपनी अहंता-ममता को लाए बिना उसे शुद्ध लीला के रूप में देखते हैं। हरि सर्व निजात करति यह विवेक है। पर अगर किसी विषय में हमको यह होता है कि यह तो मेरी भावना है और किसी विषय में ऐसा होता है कि यह भगवान की प्रेरणा है तब तो फिर हम निष्पक्ष रूप से सभी चीज को भगवत्प्रेरणा के रूप में नहीं देख पा रहे हैं, तो उस स्थिति में फिर जो हम कर रहे हैं वो हमारी अहंता से प्रेरित है। तब निश्चय कर पाना मुश्किल हो जाएगा कि कौन सी भगवत्प्रेरणा है और कौन सी हमारी प्रेरणा है।
श्लोक २५ का पारायण एवं श्लोकार्थ
सुबोधिनी जी में कहा गया है कि तथापि आपने जो आज्ञा की है, उसका पालन करने के लिए तो कुछ करना ही होगा। ब्रह्मा जी कहते हैं कि केवल एक विनय है कि मेरी याचना योग्य है या अयोग्य, इसका विचार मत करिए। मैं जो कुछ मांगू, उसे कृपा करके दे दीजिए। यहां 'नाथितम' शब्द का अर्थ याचित है। मांगा हुआ अवश्य देना ही चाहिए। स्वामी का कर्तव्य है कि वह अपने सेवक की मांग को दे ही, क्योंकि सेवकों को अपने मालिक के सिवाय दूसरी गति नहीं है।
ब्रह्मा जी दो विशेष प्रार्थनाएं कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मुझे इस बात का बड़ा संदेह रहता है कि सर्वश्रेष्ठ आप कौन हैं और आपसे अश्रेष्ठ पदार्थ कौन है। वे 'परावर' रूपों को जानना चाहते हैं। ब्रह्मा जी पुरुषोत्तम रूप (पर रूप) और यह दिखता हुआ रूप (अवर रूप) दोनों समझना चाहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि पुरुषोत्तम पर रूप और अक्षर अवर रूप, प्रकट अवर रूप और अप्रकट पर रूप, अवतार अपर रूप और अवतारी पर रूप - इन सबके रूपों को मैं जानना चाहता हूं। आप मुझे ऐसा वर दीजिए कि मैं ये सब कुछ समझ जाऊं।
प्रश्नोत्तर — स्वामी का कर्तव्य और षट् गुण
एक सहभागी ने पूछा कि स्वामी का कर्तव्य है कि वह अपने सेवक की मांग को दे, लेकिन क्या पिता को पुत्र के लिए यह नहीं सोचना चाहिए कि जो मांगा जा रहा है वह यथोचित है या नहीं। दूसरे प्रश्न में, वेद में जितने भी रूपों का निरूपण है, वे सब ऐश्वर्य संबंधी ही हैं, यह बात समझ में नहीं आई क्योंकि वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य धर्म संबंधी पांच रूप अन्य भी बताए गए हैं।
वक्ता ने स्पष्ट किया कि ब्रह्मा जानते हैं कि भगवान का ज्ञान अप्रतिबद्ध है, सभी भूतों के अध्यक्ष हैं और सबके भीतर विराजते हैं। अतः वे सेवक की याचना और हित दोनों को जानते ही हैं। वेद मुख्य रूप से ईश्वर के अरूप का प्रतिपादन करता है, जो ब्रह्म का व्यापक, सर्व कारण रूप या अंतर्यामी रूप है, जबकि रूपी भगवान का स्वरूप पुराण प्रतिपादित करते हैं। ब्रह्मा जी वेदगर्भ होते हुए भी वेद से प्राप्त ज्ञान से संतुष्ट नहीं हैं। वे उस अरूपी वेद में प्रतिपादित अरूपी स्वरूप के अतिरिक्त भगवान के अन्य स्वरूपों को भी जानना चाहते हैं, क्योंकि वेद में भगवान के सभी पहलुओं को समझने के लिए पर्याप्त निरूपण नहीं है। वक्ता ने समझाया कि अवतार रूप में प्रायः धोखा हो जाता है और मूढ़ लोग भगवान को जान नहीं पाते, जैसा कि गीता में "अवजानती माम मूढ़ा मानुष तनु भाषितम" कहा गया है। यदि भगवान लोकोत्तर रूप प्रकट करें, तो कोई भी पहचान जाएगा, पर हमारे जैसे प्रकट होने पर समझना कठिन हो जाता है।
प्रश्नोत्तर — ज्ञान कर्म का अंग
एक सहभागी ने प्रश्न किया कि ब्रह्मा जी के वाक्य "यह समझ हो जाना भी मेरे कर्म का अंग है, क्योंकि यह ज्ञान पदार्थ कर्म के लिए है। शेष पदार्थ इस न्याय के अनुसार पर ज्ञान कर्म का अंग है।" का तात्पर्य क्या है। वक्ता ने समझाया कि ब्रह्मा जी पर और अवर रूपों को जानने की प्रार्थना इसलिए कर रहे हैं ताकि उन्हें आदि और अंत का अच्छी तरह से ज्ञान हो जाए।
इतना ज्ञान हो जाने पर उन्हें यह समझ में आ जाएगा कि उन्हें क्या करना है, अर्थात भगवान के लिए क्या सृष्टि करनी है। यह ज्ञान, जो उन्हें भगवान के इन परावर रूपों का प्राप्त होगा, उनके लिए जो इस समय सृष्टि कर्म रूप प्रसंग उपस्थित हुआ है, उसके अंगभूत ज्ञान है। यह ज्ञान उन्हें अपने कर्तव्य के निष्पादन में सहायक होगा।
श्लोक २६ का पारायण एवं श्लोकार्थ
वक्ता ने श्लोक २६ का पारायण किया। श्लोकार्थ में बताया गया कि ब्रह्मा जी कहते हैं कि आप अपनी निज शक्ति को सम्मिलित रखकर उसकी आवांतर अनेक शक्तियों से युक्त होकर इस आत्मा-आत्म रूप जगत को अपने आप ही कभी छिपा लेते हो, कभी तोड़ देते हो, कभी ग्रहण करते हो, और कभी पोषण पहुंचाते हो।
यहां भगवान की निज माया शक्ति के विभिन्न कार्यों का वर्णन है, जिससे वे जगत में संहार, सृजन, पालन आदि अनेक लीलाएं करते हैं। भगवान अपनी विविध शक्तियों के माध्यम से सृष्टि में विविध प्रकार की क्रियाओं का संपादन करते हैं।
श्लोक २७ का पारायण एवं श्लोकार्थ
वक्ता ने श्लोक २७ का पारायण किया। श्लोकार्थ में बताया गया कि ब्रह्मा जी भगवान को अव्यर्थ इच्छा वाले (अर्थात सत्य संकल्प) बताते हुए कहते हैं कि आप जैसे मकड़ी अपने जाले से खेल करती है, उसी तरह आप भी खेल करते रहते हो। मैं चाहता हूं कि हे ऐश्वर्य पति, इन सब विषयों की बुद्धि मुझ में भी कर दी जावे।
ब्रह्मा जी ऐसी बुद्धि चाहते हैं जिससे वे भगवान के अव्यर्थ संकल्प और लीलाओं को ठीक से समझ सकें, ताकि वे अपनी सृष्टि के कार्य को भगवदिच्छा के अनुरूप कर सकें और उसमें किसी प्रकार की त्रुटि न हो।
श्लोक २८ का पारायण एवं श्लोकार्थ
वक्ता ने श्लोक २८ का पारायण किया। श्लोकार्थ में बताया गया कि ब्रह्मा जी की यह भी प्रार्थना है कि प्रजा सर्ग के विषय में भगवान उन्हें कुछ शिक्षा दें। वे भगवान की शिक्षा को सावधान रहकर पालन करेंगे और जिस सिखावन के अनुग्रह में वे विश्व रचना करते समय उस कार्य में आसक्त नहीं होंगे।
यहां ब्रह्मा जी का अभिप्राय है कि वे निष्काम भाव से सृष्टि कर सकें और आसक्ति के बंधन से मुक्त रहें, क्योंकि भगवान की शिक्षा के अनुसार कार्य करने से आसक्ति नहीं होती। यदि कोई भगवान के विषय में कहता हो तो उसका भी यही उत्तर है कि प्रजा सृष्टि में यदि विषमता या निर्दयता आवे तभी भगवान को उस प्रजा सर्ग से बंद प्राप्त होता है। किंतु शिक्षा देने में तो भगवान को वैषम्य और निर्दयता प्राप्त नहीं हो सकती। ब्रह्मा जी चाहते हैं कि प्रभु जो चाह रहे हैं, वैसा का वैसा वो जगत में बनाओ। आलस्य का कोई कारण नहीं है।
प्रश्नोत्तर — सृष्टि में वैषम्य का दोष
एक सहभागी ने प्रश्न किया कि ब्रह्मा जी को सृष्टि में ऊंच-नीच (विषमता) बनाने पर दोष क्यों नहीं लगेगा, और भगवान को वैषम्य या निर्दयता का दोष क्यों नहीं होगा। वक्ता ने समझाया कि यदि ब्रह्मा भगवान की आज्ञा के पालन के रूप में ऐसी सृष्टि करेंगे, तो ब्रह्मा के ऊपर ये दोष नहीं रह जाएगा।
भगवान को वैषम्य का दोष इसलिए नहीं लगता क्योंकि वे शिक्षा दे रहे हैं, और शिक्षा देने में भगवान को वैषम्य और निर्दयता प्राप्त नहीं हो सकती। ब्रह्मा बीच में ढाल बन जाएंगे, जिससे भगवान पर सीधा दोषारोपण नहीं होगा। यदि भगवान ने कुछ चाहा और ब्रह्मा ने अन्यथा किया, तो अन्यथाकरण से ब्रह्मा को दोष लगेगा। महाप्रभुजी निबंध में समझाते हैं कि भगवान की लीला होने से या आत्म सृष्टि होने से वैषम्य-निर्दयता का कोई प्रसंग नहीं है। द्वितीय आदि सृष्टि जो ब्रह्मा द्वारा की जानी है, वो कर्म सापेक्ष हो जाएगी, इसलिए भगवान पर दोष नहीं आएगा।