मंगलाचरण\n[मंगलाचरण की सामग्री का वर्णन नहीं किया जाना चाहिए।]
द्वितीय स्कंद, अध्याय ९ का उपक्रम\nयह खंड श्रीभागवत सुबोधिनी जी के द्वितीय स्कंद, अध्याय ९ के श्लोक २४ से २८ के पारायण का उपक्रम प्रस्तुत करता है। इसमें पूर्व श्लोक २० में ब्रह्माजी को वर मांगने की प्रेरणा, श्लोक २१ में विश्वोत्पत्ति का भगवत्प्रेरित होना, श्लोक २२ में ब्रह्माजी की कर्तव्यविमूढ़ता और भगवान की आज्ञा, तथा श्लोक २३ में भगवान की क्रिया शक्ति व ज्ञान शक्ति का विवेचन किया गया। महाप्रभुजी की शैली में शंका निवारण की महत्ता भी समझाई गई।
प्रश्नोत्तर — भावों में भगवत्प्रेरणा\nवक्ता से यह प्रश्न पूछा गया कि क्या जीव को होने वाली सभी कामनाओं और भावों के प्रेरक प्रभु ही हैं। उत्तर में भगवत्प्रेरणा के सिद्धांत पर प्रकाश डाला गया, जहाँ सुख, दुःख, भय आदि सभी भावों को भगवान द्वारा प्रकटित बताया गया। इस बात पर जोर दिया गया कि यदि व्यक्ति सभी भावों को भगवत्प्रेरित माने, तो अहंता-ममता से मुक्त होकर लीलात्मकता को समझ सकता है। यह भी स्पष्ट किया गया कि ब्रह्माजी के हृदय में उत्पन्न हुई कामना भी भगवान द्वारा ही प्रेरित थी।
श्लोक २५ — पर और अवर रूपों की जिज्ञासा\nब्रह्माजी ने भगवान से याचना की कि वे उनकी मांग को योग्य या अयोग्य न समझें, क्योंकि सेवक की एकमात्र गति स्वामी ही होता है। उनकी विशेष प्रार्थना थी कि वे भगवान के 'पर' और 'अवर' रूपों को जानना चाहते हैं। 'पर' रूप वह जो सर्वथा बुद्धि और शब्द से अस्पृश्य है, और 'अवर' रूप वह जो जगतवर्ती सभी रूपों में व्याप्त है। ब्रह्माजी यह भी जानना चाहते थे कि वेदों में वर्णित रूप ईश्वर के ऐश्वर्य संबंधी हैं, परंतु वे भगवान के वास्तविक, अप्रकट और अवतार-अवतारी स्वरूपों को समझना चाहते हैं, जिन्हें वेद में मिलना संभव नहीं है।
प्रश्नोत्तर — अरूपी स्वरूप का ज्ञान\nइस खंड में यह प्रश्न उठाया गया कि वेद में ईश्वर के जिन रूपों का निरूपण है, वे ऐश्वर्य संबंधी हैं, तो भगवान के अन्य पांच गुणों का क्या। वक्ता ने स्पष्ट किया कि वेद मुख्य रूप से ईश्वर के अरूपी स्वरूप का प्रतिपादन करते हैं, जबकि रूपी भगवान का स्वरूप पुराणों में वर्णित है। ब्रह्माजी की जिज्ञासा वेद प्रतिपादित अरूपी स्वरूप से अतिरिक्त रूपों को जानने की है, ताकि वे भगवान के सभी पहलुओं को समझ सकें और अवतारों में होने वाले धोखे से बच सकें। इस प्रकार वे अवतारी और अवतार रूपों को समझना चाहते हैं।
श्लोक २६-२७ — भगवान की लीला शक्ति\nइस खंड में भगवान की आत्ममाया योग शक्ति का वर्णन है, जिसके द्वारा वे अपनी निज शक्ति को सम्मिलित रखकर अनेक शक्तियों से युक्त होकर इस आत्मात्म रूप जगत को कभी छिपाते हैं, कभी तोड़ते हैं, कभी ग्रहण करते हैं और कभी पोषण पहुँचाते हैं। ब्रह्माजी भगवान को अमोग संकल्प वाला बताते हुए कहते हैं कि वे मकड़ी की तरह अपने जाले से खेल करते हैं, उसी तरह आप भी लीला करते रहते हो। ब्रह्माजी ने इन सब विषयों की बुद्धि प्राप्त करने की याचना की। भगवान की इच्छाओं को अव्यर्थ बताया गया है।
श्लोक २८ — सृष्टि में अनासक्ति की प्रार्थना\nब्रह्माजी ने प्रार्थना की कि भगवान उन्हें प्रजा सृष्टि के विषय में शिक्षा दें। वे भगवान की शिक्षा को सावधान रहकर पालन करेंगे। उनकी याचना है कि भगवान के अनुग्रह से वे विश्व रचना करते समय उस कार्य में आसक्त न हों। ब्रह्माजी का अभिप्राय है कि भगवान जैसी इच्छा करें, वैसा ही जगत में वे बनाएँ, और आलस्य का कोई कारण न हो। वे भगवान से ऐसी शिक्षा चाहते हैं जिससे उन्हें बंधन न हो। भगवान की शिक्षा के अनुसार कार्य करने से आसक्ति नहीं होगी।
प्रश्नोत्तर — सृष्टि दोष से मुक्ति\nयह प्रश्न उठाया गया कि प्रजा सृष्टि में ऊँच-नीच, विषमता या निर्दयता आने पर ब्रह्माजी पर दोष क्यों नहीं आता। वक्ता ने स्पष्ट किया कि यदि भगवान ब्रह्माजी को आज्ञा दें और ब्रह्माजी उनके आज्ञापालन में सृष्टि करें, तो ब्रह्माजी पर दोष नहीं रहता। भगवान पर भी दोष नहीं आता क्योंकि वे शिक्षा दे रहे हैं, और शिक्षा देने में वैषम्य या निर्दयता नहीं हो सकती। महाप्रभुजी के अनुसार, भगवान की लीला होने के कारण वैषम्य-निर्दयता का प्रसंग नहीं है, और द्वितीय सृष्टि कर्म सापेक्ष होने से कर्मानुसार फल मिलता है।