भावना का महत्व एवं सेवा में उसका अनुप्रयोग
वक्ता समझाते हैं कि भगवद्सेवा में केवल यांत्रिक क्रिया नहीं, अपितु `भावना` का होना अत्यंत आवश्यक है। भावहीन सेवा केवल एक यांत्रिक क्रिया बन जाती है। उन्होंने `रूप चेतना` अर्थात् भगवान के बालकृष्ण, मदनमोहनजी, मधुराधीशजी जैसे स्वरूपों का चिंतन करने पर बल दिया। श्रीमहाप्रभुजी द्वारा दशम स्कन्ध में उल्लिखित ईश्वर के दोनों रूप—भौतिक रूप और `हरित आत्मा` (लीला रूप)—पर मनन करने की बात कही गई है। वक्ता ने मधुराष्टकम और गोपीजनवल्लभाष्टकम जैसे स्तोत्रों के माध्यम से भी भावना को अनुरूप करने की बात कही। व्रज के भक्तों जैसे यशोदाजी का स्नेह, नंदरायजी का पितृप्रेम, और गोपसखाओं का मित्रभाव स्मरण कर सेवा करने का मार्गदर्शन किया गया, जिसमें सेवा स्थल को नंदरायजी का घर और जल को यमुना जल के रूप में देखना शामिल है। सेवा में आने वाले प्रतिबंधों, जैसे लोभ, क्रोध, रोष, लालच और घृणा को बकासुर और कंस जैसे राक्षसों के रूप में देखकर भावना व्यक्त करनी चाहिए।
अवतार का मुख्य उद्देश्य और प्रतिबंध पर विचार
वक्ता ने भगवद्गीता के श्लोक 'यदा यदा हि धर्मस्य' का उल्लेख कर भगवान के `अवतार` के कारणों पर चर्चा की। उन्होंने वेदव्यासजी द्वारा भागवत में वर्णित भगवान के अवतार का मुख्य कारण `भक्तों का उद्धार` बताया। दुष्टों का नाश और धर्म की स्थापना जैसे कारण परिणामी हैं; मुख्य प्रयोजन भक्त को बचाना है। ईश्वर के अवतार का उद्देश्य केवल भक्त को बचाना है, दूसरों को नहीं। प्रह्लादजी, ऋषिगण, व्रजभक्त, नंदरायजी, यशोदाजी, देवकीजी, वसुदेवजी जैसे भक्तों के उद्धार हेतु ईश्वर ने अवतार लिया। वक्ता ने समझाया कि जब ठाकुरजी घर में विराजते हैं, तो यह एक उत्सव जैसा होता है, जैसे अवतार काल में नंदा उत्सव मनाया गया था, और जन्मदिन जैसे प्रसिद्ध त्योहारों को भी गुरु से समझकर मनाना चाहिए। किसी भी कार्य में आने वाले `प्रतिबंधों` और उनके समाधान पर चिंतन करना आवश्यक है, क्योंकि जीवन में बाधाएँ आती रहती हैं।
भगवद् शरण एवं अज्ञान का विनाश
वक्ता ने नंदरायजी और वसुदेवजी के प्रसंग से `भगवद् शरण` के महत्व को समझाया। वसुदेवजी ने श्रीकृष्ण को गुप्त रूप से नंदरायजी के घर पहुँचाया था। वक्ता ने 'वासुदेव' (श्रीकृष्ण) और 'वसुदेवजी' (श्रीकृष्ण के पिता) के उच्चारण का भेद स्पष्ट किया। जब नंदरायजी मथुरा में कंस से होने वाली परेशानियों के बारे में जानकर चिंतित हुए और वासुदेवजी ने उन्हें गोकुल में उपद्रवों के प्रति आगाह किया, तब नंदरायजी ने भगवान से प्रार्थना कर उनकी `शरण` ली और अनुभव किया कि `ईश्वर ही मेरा रक्षक` और आश्रय है। वक्ता ने इस बात पर जोर दिया कि ईश्वर की शरण ही समस्याओं का समाधान है। उन्होंने `अज्ञान के विनाश` का भी उल्लेख किया, जहाँ पुत्र माया के रूप में आए भगवान ने यशोदाजी और नंदरायजी सहित सभी व्रजवासियों को मोहित कर उनके अज्ञान को नष्ट कर दिया। यह अवतार काल में भक्तों के अज्ञान को दूर करने का एक प्रकार है, जिससे उनकी शक्ति ईश्वर में सुदृढ़ होती है। सिद्धांत को अनुभव करके सिखाया जा सकता है, हर चीज का अनुभव स्वयं करना आवश्यक नहीं। वक्ता ने एक वैष्णव मित्र के ठाकुरजी को यात्रा के लिए दूसरे वैष्णव के घर भेजने और फिर स्वयं न बुलाने की घटना का भी उदाहरण दिया, जिसमें `महाविद्यालय` का भाव निहित है। इसी प्रकार, अवतार काल में अपनी माया से अज्ञान का निवारण होता है।