श्लोक २९ : सृष्टि रचना में गर्वाभाव की प्रार्थना
द्वितीय स्कन्ध के नवम अध्याय के २९वें श्लोक का निरूपण किया गया।
भगवान द्वारा ब्रह्माजी को वरदान मांगने की आज्ञा दिए जाने पर ब्रह्माजी प्रार्थना करते हैं।
भगवान ने अपने सखा के समान समानता और सामर्थ्य प्रदान कर जगत कर्ता के पद पर स्थापित किया।
ब्रह्माजी विविध प्रजाओं का वर्गीकरण और उनके भोग्य पदार्थों की रचना करते हुए भगवद्सेवा में सावधान रहने का संकल्प करते हैं।
वे प्रार्थना करते हैं कि सृष्टि रचना करते हुए उनमें अजन्मा होने या कर्ता होने का कोई अभिमान न आने पावे।
श्लोक २९ : चित्-आनन्द रूपता एवं भगवत्-शक्तियाँ
श्लोक २९ के पदों के अन्वय और श्रीसुबोधिनी व्याख्या पर गहन विचार किया गया।
चित् और आनन्द दोनों भगवद्धर्म हैं, जिनमें भगवान आनन्द रूप हैं और ब्रह्माजी चिद्रूप हैं।
क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति आनन्द धर्म के होने से मूलतः भगवान में ही स्थित रहती हैं।
भगवान ने कृपा करके ज्ञान और क्रियाशक्ति का दान कर ब्रह्माजी को अपने समान सामर्थ्यवान बनाया।
उत्पादन शक्ति, विभाग सामर्थ्य और सेवा में व्यग्रता न होना—इन गुणों से कहीं अभिमान न हो, इसका समाधान किया गया।
श्लोक ३० : भगवत्स्वरूप ज्ञान, विज्ञान एवं रहस्य
ब्रह्माजी द्वारा मांगे गए चार वरों—परावर ज्ञान, क्रीड़ा ज्ञान, शिक्षा और गर्वाभाव का उपसंहार किया गया।
श्लोक ३० में भगवान ब्रह्माजी को परम गुह्य ज्ञान, विज्ञान, रहस्य और अंग सहित ग्रहण करने का उपदेश देते हैं।
भगवान का पुरुषोत्तम स्वरूप वाणी का अवक्तव्य विषय है, जिसे भगवान के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जानता।
वैकुण्ठ दर्शन और भगवत्पार्षदों का साक्षात्कार अनुभव रूप विज्ञान है तथा नवधाभक्ति परायणता उसका रहस्य है।
भगवान के सेवकों के प्रति प्रसन्नता और कृपा-दृष्टि इस ज्ञान का मुख्य अंग है।
श्लोक ३१ : भगवद्-अनुग्रह से यथार्थ तत्त्व-विज्ञान
श्लोक ३१ के माध्यम से परावर ज्ञान का दूसरा अंश प्रतिपादित किया गया।
भगवान ब्रह्माजी को आशीर्वाद देते हैं कि प्रमाण और परिमाण से मैं जितना हूँ, वैसा ज्ञान तुम्हें हो।
भगवान की कारणरूपा सत्ता, सर्वकार्यकरण सामर्थ्य रूपा शक्ति, विविध रूप, गुण और कर्मों का तत्त्वतः स्फुरण हो।
तत्व विज्ञान का अर्थ है प्रत्येक पदार्थ की यथार्थता को उसके वास्तविक स्वरूप में जानना।
यह तत्त्वज्ञान केवल बौद्धिक तर्क से नहीं, अपितु केवल भगवद्-अनुग्रह से ही सुलभ होता है।
श्लोक ३२ : चतुःश्लोकी भागवत: मूल ब्रह्मवाद एवं सृष्टिरूपता
चतुःश्लोकी भागवत का प्रथम श्लोक (श्लोक ३२) 'अहमेवासमेवाग्रे' विचारार्थ लिया गया।
सृष्टि से पूर्व केवल भगवान ही थे, सत्-असत् अथवा उससे परे अन्य कुछ नहीं था।
सृष्टि के अनन्तर दृश्यमान और अदृश्यमान सम्पूर्ण प्रपञ्च भगवान का ही स्वरूप है।
जगत में जो अन्यथा प्रतीति (भेद, उच्च-नीच भाव) होती है, वह भगवन्माया के कारण है।
ब्रह्माजी को शिक्षा दी गई कि सर्वत्र भगवद्भाव का अनुसंधान करते हुए सृष्टि करने पर कभी मोह या गर्व नहीं होगा।
श्लोक ३२ : सर्वत्र भगवद्भाव एवं अविरोध समन्वय
श्लोक ३२ के उत्तरार्ध और श्रीसुबोधिनी कारिकाओं का विशद विवेचन किया गया।
सृष्टि के पश्चात् काल, गुण, शक्ति और कार्य रूप में भगवान ही अपने-आपको प्रकट करते हैं।
असत से सत की उत्पत्ति मानने वाले नैयायिक-वैशेषिक मत का निराकरण कर श्रुति-सम्मत ब्रह्मवाद स्थापित किया गया।
शास्त्रों के परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाले वचनों में अविरोध सिद्ध करना ही मुख्य विचार है।
प्रलय काल में जब सब तिरोहित हो जाता है, तब जो अविनाशी अवशिष्ट रहता है, वह भी भगवान ही हैं।