मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भिक मंगलाचरण के लिए है। इसमें वक्ता द्वारा श्रीवल्लभाचार्यजी और श्रीगुसाईंजी को प्रणाम किया जाता है और अज्ञानजनित अंधकार को दूर करने की प्रार्थना की जाती है।
चतुष्की श्री भागवत के प्रथम श्लोक का सार
वक्ता ब्रह्माजी द्वारा वरदान मांगने पर भगवान द्वारा प्रथम दो वचनों के ज्ञान तथा चतुष्की श्री भागवत के प्रथम श्लोक के स्मरण के साथ सत्र का आरम्भ करते हैं। भगवान ने ब्रह्माजी को शिक्षा के लिए यह ज्ञान प्रदान किया था, जिसमें ब्रह्मवाद का स्वरूप समझाया गया था। ब्रह्माजी को यह ज्ञात हुआ कि ब्रह्म ही जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय का एकमात्र कारण है, और सब कुछ आत्मा यानी ब्रह्म ही है।
श्लोक ३४ की उत्थानिका — माया के निरूपण का उद्देश्य
अग्रिम श्लोक की उत्थानिका में ब्रह्म के प्रमेय रूप में निश्चय के बाद प्रमाण की आवश्यकता पर शंका उठाई गई है। यदि सब कुछ ब्रह्म ही है, तो प्रमाणों का क्या उपयोग? इस शंका का निराकरण माया के निरूपण द्वारा किया जाएगा। वक्ता समझाते हैं कि ब्रह्म ने अपने नाम, रूप और कर्मों में प्रवृत्ति का संकोच किया है, जिससे जगत में गुण और दोष प्रकट हुए हैं। यह ब्रह्म की लीला ही है।
श्लोक ३४ — माया का स्वरूप: विद्यमान को अप्रकाशित करना
श्लोक 'न प्रति तचात्मनी त्व विद्यात्मनो माया यथा भासो यथा तमाम' के अर्थ का विवेचन करते हुए वक्ता कहते हैं कि वस्तु के अतिरिक्त जिसकी प्रतीति होती है, और वस्तु स्वयं की प्रतीति नहीं होती, वह आत्मा की माया है। माया दो प्रकार से भ्रम पैदा करती है: एक तो विद्यमान वस्तु का प्रकाशन न करना, और दूसरा अविद्यमान का प्रकाशन करना। यह माया शक्ति ब्रह्म के सच्चिदानंद स्वरूप को सर्वत्र प्रकट नहीं होने देती, जिससे तारतम्य और दोषयुक्त प्रतीति होती है। इस माया के कारण ही जीव को वस्तु का अन्यथा ज्ञान होता है।
श्लोक ३४ — जगत का ब्रह्मात्मक स्वरूप और माया का व्यामोह
माया से व्यामोहित बुद्धि पदार्थ को अन्यथा मानने लगती है, यद्यपि पदार्थ अन्यथा नहीं होते। वक्ता इस पर शंका का समाधान करते हैं कि वस्तु स्वयं ऐसी ही क्यों नहीं मान ली जाए, क्योंकि सबको एक समान ही दिखता है। आचार्य चरण स्पष्ट करते हैं कि प्रमाणभूत वेद 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' कहता है और ब्रह्मज्ञानियों को भी जगत ब्रह्मात्मक प्रतीत होता है। अतः, भ्रांत लोगों की प्रतीति से तत्व का निर्णय नहीं किया जा सकता। हमारी दृष्टि में माया जनित विषयता के कारण ही ब्रह्म रूप जगत अपने शुद्ध रूप में दिखलाई नहीं देता, जिससे प्रमाणों की आवश्यकता पड़ती है।
श्लोक ३४ — आत्मा के विषय में माया का प्रभाव
वक्ता बताते हैं कि जिस प्रकार जगत के विषय में माया अन्यथा प्रतीति कराती है, उसी प्रकार आत्मा के विषय में भी करती है। वह विद्यमान आत्मा का प्रकाशन नहीं करने देती और अविद्यमान का प्रकाशन करती है। इस पर शंका की जाती है कि यदि सभी जन ऐसा ही मानते हैं, तो जगत को ब्रह्म से भिन्न क्यों न मान लिया जाए? आचार्यजी कहते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि माया ही विद्यमान वस्तु का बोध नहीं करने देती और अविद्यमान का बोध कराती है। सार्वजनिक प्रतीति के आधार पर सत्य का निर्धारण नहीं किया जा सकता, जैसे सूर्य के उदय-अस्त या रेल की पटरियों का मिलना दिखना। यह माया का व्यामोह ही है।
श्लोक ३४ — माया द्वारा पदार्थ जनन और अंधकार का दृष्टांत
शंकाकार प्रश्न करता है कि माया पदार्थ को कैसे पैदा कर सकती है, वह तो केवल व्यामोह करती है। आचार्यजी अंधकार का उदाहरण देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि अंधकार केवल प्रकाश का अभाव नहीं, बल्कि स्वयं में एक पदार्थ है, जिसे माया पैदा करती है। अंतरिक्ष में भी प्रकाश के फोटोंस होते हुए भी हमें अंधकार दिखता है। यह माया का व्यामोहिका कार्य है, जो उल्लूओं के उदाहरण से भी स्पष्ट होता है, जहाँ उनके लिए दिन में अंधकार होता है। इस प्रकार माया अपनी आच्छादिका और अन्यथा प्रतीति हेतु रूपा विषयता पैदा करती है।
श्लोक ३४ — आदर्श में मुख का दृष्टांत और विषयता का स्पष्टीकरण
माया द्वारा विषयता जनन को समझाने के लिए वक्ता दर्पण (कांच) में मुख के प्रतिबिंब का उदाहरण देते हैं। जैसे कांच में अनेक मुख दिखलाई देते हैं, पर वास्तव में वे नहीं होते, वैसे ही माया विषयता को उत्पन्न करती है। फिजिक्स में इसे परावर्तन कहा जाता है, जहाँ एक वस्तु के अनेक गुणित प्रतिबिंब दिखते हैं। यह सिद्ध करता है कि हमारी आँखें किसी विद्यमान पदार्थ के संपर्क में होती हैं, जिसे विषयता कहते हैं। इसी प्रकार माया मोहित पुरुष की बुद्धि में आच्छादिका और अन्यथा प्रतीति हेतु रूपा दो प्रकार की विषयताएँ पैदा कर देती है। एक ब्रह्म रूपता को प्रकाशित नहीं होने देती, दूसरी जगत रूपा विषयता को प्रकट करती है। इन दोनों प्रकार की माया का निवारण करने के लिए ही प्रमाणों का उपयोग होता है।
श्लोक ३५ — ब्रह्म के उभयविध स्वरूप का निरूपण
वक्ता श्लोक 'यथा महती भूतानी भूतेशु वचे प्रविष्ट्य प्रविष्टानी तथा' का विवेचन करते हैं। वेद पदार्थ का निरूपण साकार, निराकार, सावयव, निरवयव, पूर्ण, परिच्छिन्न आदि दोनों प्रकार से करते हैं। यदि ब्रह्म को केवल एक रूप में स्वीकार किया जाए, तो वेद का प्रामाण्य अंशतः अप्रामाण्य हो जाएगा। वेद के सर्व प्रामाण्य की सिद्धि के लिए ब्रह्म के उभयविध स्वरूपों को समझना आवश्यक है। जैसे महाभूत (आकाश आदि) घटपटादि भौतिक पदार्थों में कारण रूप से प्रविष्ट होते हैं, और फिर अनुप्रविष्ट होते हुए भी अप्रविष्ट रहते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म भी जगत में प्रविष्ट होकर भी अप्रविष्ट है।
श्लोक ३५ — भगवान का अन्वय-व्यतिरेक स्वरूप और दशविध लीला
भगवान कहते हैं कि मैं सभी का कारण हूँ, सभी जगह मेरा अनुप्रवेश भी है, फिर भी मैं किसी का कारण नहीं भी होता और किसी में मेरा प्रवेश नहीं भी होता। यह भगवान का अन्वय और व्यतिरेक स्वरूप है। जैसे मिट्टी मटके में कारण रूप से प्रविष्ट होती है और कार्य भी कारण में समवेत होकर उत्पन्न होता है। कुंभकार द्वारा निर्मित घट प्राकृत है, जबकि नित्य जगत भगवत्स्वरूप है। ब्रह्माजी नित्य सृष्टि के पदार्थों की मात्र अभिव्यक्ति करते हैं। महाभूतों में आधारत्व, आधेयत्व और विशेषतः आधेयत्व—ये तीनों बातें होती हैं। भगवान में भी यह दशविध लीला युक्त स्वरूप है, जिसमें सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, पूति प्रवेश रूप हैं, और बन्ध, निरोध, मुक्ति, आश्रय व्यतिरेक रूप में हैं। यह सब भगवान की दशविध लीलाएँ हैं। वक्ता अगले श्लोक को अगले सत्र में लेने का संकेत देते हैं।