मंगलाचरण
यह खण्ड सत्र के प्रारम्भ में परम्परागत मंगलाचरण के लिए है। इसमें वक्ता द्वारा श्रीगुरु एवं आराध्य के प्रति वन्दना की जाती है।
चतुःश्लोकी भागवत का सन्दर्भ एवं प्रमेय-प्रमाण-विषय निरूपण
ब्रह्माजी के वरदान मांगने के बाद भगवान ने उनको जो चार वर्ग दिए हैं, उनका निरूपण चतुःश्लोकी भागवत के साथ चल रहा है। इसमें उत्थानिका में एतावदेव जिज्ञासम विषय का निरूपण हुआ। प्रमेय, प्रमाण और विषय इन तीनों में युक्ति कहते हैं कि प्रमेय भगवान हैं, प्रमाण वेद हैं और विषय जगत रूप भगवान हैं। देखा जाए तो तीनों भगवान ही सिद्ध होते हैं। आचार्यचरण स्पष्ट करते हैं कि श्रीभागवत शास्त्र में केवल इन तीन पदार्थों की ही जिज्ञासा की गई है, न कि न्याय-वैशेषिक के सोलह पदार्थों की, क्योंकि उन चीजों का आत्मा के लिए कोई महत्व नहीं है। प्रमेय शब्द से भगवत्स्वरूप, प्रमाण शब्द से वेद और वेदोक्त साधन, तथा विषय शब्द से दशविध लीला में भक्ति यानी स्नेह लिया गया है। आत्मा के उद्धार में इन तीनों का ही उपयोग है।
अन्वय-व्यतिरेक सिद्धांत का स्वरूप एवं आधुनिक संदर्भ
परमात्मा के तत्व को जानने की इच्छा रखने वाले को इतना जानना आवश्यक है कि अन्वय और व्यतिरेक से जो सब जगह और सब काल में रहता है, वही असल तत्व है। अन्वय का मतलब पदार्थ मात्र के साथ जो लगाव है और व्यतिरेक जो सबसे बढ़ जाए। वक्ता मायावादियों के अन्वय-व्यतिरेक के अर्थ का निराकरण करते हैं और ब्रह्मवाद के अनुसार अन्वय-व्यतिरेक को समझाते हैं। उदाहरण देते हैं कि ब्रह्म जगत रूप होता है, पर पूरा का पूरा ब्रह्म जगत में खप नहीं जाता है। जितना ब्रह्म जगत बनता है, उतना ब्रह्म का जगत में अन्वय है और बनने के बाद भी जो ब्रह्म अवशिष्ट है, वह उसका जगत से व्यतिरेक है। सत, चित् और आनंद का जगत में अन्वय अस्ति, भाति, प्रिय के रूप में समझाया गया। घट-पट के उदाहरण से ब्रह्म का अन्वय-व्यतिरेक स्पष्ट किया गया। ब्रह्म ही सर्वत्र अन्वय है और सबसे बढ़ता रहता है। ब्रह्मत्व को सिद्ध करने के लिए अन्वय और व्यतिरेक दोनों की आवश्यकता है। भगवान जगत में पांच प्रकार से अन्वय को प्राप्त होते हैं—कारण, कार्य, आधार, आधेय, और स्वरूपात्मना, तथा पांच प्रकार से व्यतिरेक भी रखते हैं। इस प्रकार भगवान दशविध लीला सहित इस जगत में विद्यमान रहते हैं।
देश, काल और वस्तु के रूप में भगवत्स्वरूप एवं माया का प्रभाव
देश (स्पेस) की प्रतीति मायाजन्य है, यानी माया जन्य है। भगवान की चेष्टा ही काल के रूप में प्रकट होती है, जैसा कि तृतीय स्कंध में कहा गया है कि 'चेष्टाहु चेष्ट विश्वम'। इससे यह सिद्ध हुआ कि देश, काल और वस्तु से नपातुला नहीं और देश, काल, वस्तुओं का वस्तु स्वरूप भगवान कहते हैं कि 'मैं ही हूँ'। इस तरह सर्वात्मा भगवान ही जिज्ञास्य हैं, जानने योग्य हैं। श्रुति वाक्य भी संपूर्ण जगत को भगवत् रूप कहते हैं। भगवान ने ब्रह्मा को यह शिक्षा दी है कि संपूर्ण जगत भगवान का ही स्वरूप जानो, किंतु भगवान तो जगत से भी अधिक हैं, इसलिए जगत में ही आसक्ति नहीं करनी चाहिए। भगवान श्लोक ३६ में ब्रह्माजी को आशीर्वाद देते हैं कि 'मत मात परमे समाधिना भवान कल्प विकल्पेशु न विहति करित', यानी मेरे मत में परमोक्ष समाधि के द्वारा तुम प्रतिष्ठित होगे तो सभी जगत के कल्प-विकल्पों में मेरी माया तुम्हें कभी भी बाधक नहीं होगी। जहां यह मत नहीं है, वहां ही मेरी माया मोह करा देती है।
प्रश्नोत्तर — अन्वय-व्यतिरेक, मायावाद और ब्रह्मा के अभिमान का निवारण
इस खण्ड में मायावाद के अन्वय-व्यतिरेक की परिभाषा और पुष्टिमार्ग के अन्वय-व्यतिरेक की भिन्नता पर चर्चा हुई। वक्ता ने स्पष्ट किया कि पुष्टिमार्ग ब्रह्म को जगत का अविकृत परिणाम मानता है, जबकि मायावाद उसे विवर्त मानता है। 'घट से अधिक सत ही रहता है' इस कथन को दृश्य और अदृश्य सत्ता तथा डार्क मैटर के उदाहरण से समझाया गया। वक्ता ने दशविध लीलाओं की व्याप्ति, विज्ञान का संदर्भ तथा ब्रह्मा के वत्स हरण प्रसंग का उल्लेख करते हुए भगवान के आशीर्वाद और माया के प्रभाव पर विस्तृत चर्चा की। श्लोक ३७ में आए 'हरि' और 'परमेष्ठी' शब्दों के गूढ़ अर्थ पर भी प्रकाश डाला गया, जहाँ 'हरि' दुःख दूर करने वाले और 'परमेष्ठी' जगत की उत्पत्ति, स्थिरता और अधीनता के नियामक के रूप में ब्रह्मा को शक्ति प्रदान करते हैं।