द्वितीय स्कन्ध का सार
• पाठ: द्वितीय स्कन्ध
• प्रतिभागी वाचन: (कोई प्रतिभागी वाचन नहीं)
• वक्ता विवेचन: वक्ता ने द्वितीय स्कन्ध की साधन लीला का सारांश प्रस्तुत किया। इसमें तीन मुख्य प्रकरण हैं: तत्व ध्यान (अध्याय १-२), व्रत प्रसार यानी श्रद्धा (अध्याय ३-४), और मनन यानी विमर्श (अध्याय ५-१०)। उत्पत्ति से साधन (अध्याय ५-७) और उपपत्ति से साधन (अध्याय ८-१०) के भेद भी बताए गए। वर्तमान में नवें अध्याय का अवगाहन चल रहा है, जिसका विषय जीव और ब्रह्म के संदेह का निवारण है। इस अध्याय में श्रीभागवत और ब्रह्माजी की उत्पत्ति की परंपरा बताई गई है, तथा ब्रह्मा आदि जीवों की शुद्धि और उनके विशेष अधिकार को प्रमाणित किया गया है। साक्षात् भगवान से ही ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई है और उन्हें श्रीभागवत का उपदेश भगवान ने स्वयं दिया है। इस परंपरा के निरूपण से जीवों की उत्पत्ति और साधनों से उनकी शुद्धि, तथा ब्रह्माजी का भगवत्-स्वरूप, गुण और लीला रूप भगवत श्रवण के विशेष अधिकारी होने की बात स्पष्ट होती है। ब्रह्माजी ने भगवान से पर-अवर का ज्ञान, क्रीडा का ज्ञान, जगत की रचना सिखाना और गर्व न होने के चार वर मांगे थे, जो चतुःश्लोकी भागवत में समाहित हैं।
श्लोक ३७ — भगवान का स्वरूप छिपाना
• पाठ: श्रीमद्भागवत द्वितीय स्कन्ध, अध्याय ९, श्लोक ३७
• प्रतिभागी वाचन: (कोई प्रतिभागी वाचन नहीं)
• वक्ता विवेचन: श्लोक ३७ के अनुसार, अजन्मा भगवान पुरुषोत्तम ने प्रजाओं के परम पति ब्रह्मा को इतना आदेश देकर ब्रह्मा के देखते-देखते अपना स्वरूप छिपा लिया। यह ब्रह्माजी को उपदेश देने के बाद भगवान के तिरोहित होने का वर्णन है।
श्लोक ३८ — ब्रह्मा द्वारा जगत की रचना
• पाठ: श्रीमद्भागवत द्वितीय स्कन्ध, अध्याय ९, श्लोक ३८
• प्रतिभागी वाचन: जब भगवान ने नेत्र-गुहित रूप को छिपा लिया, तब सर्वभूतमय भगवान ब्रह्मा ने भी भगवान को हाथ जोड़कर पूर्व कल्प की तरह इस जगत को पैदा किया।
• वक्ता विवेचन:
**भगवान का इंद्रियार्थ रूप:** सुबोधिनीजी के अनुसार, इंद्रियों का जो अर्थ गोचर है, वह इंद्रियार्थ कहलाता है। भगवान किसी की इंद्रियों से जाने नहीं जाते, तथापि अपनी इच्छा से भक्तों की इंद्रियों के विषय हो जाते हैं। भगवान सबके परम पुरुषार्थ रूप हैं और सामान्यतः पदार्थ रूप भी स्वयं हैं। चेतन पक्ष में भक्तों की मुक्ति के लिए वे इंद्रियों को साक्षात् दर्शन देते हैं, और जड़ इंद्रियों के पक्ष में उनके अधिष्ठाताओं को कृतार्थ करने के लिए इंद्रिय गोचर हो जाते हैं।
**ब्रह्मा के दुख की निवृत्ति:** यदि भगवान ब्रह्मा के इंद्रियार्थ रूप ही रहे आते (यानी प्रकट दर्शन देते ही रहते), तो सर्वसमष्टि रूप ब्रह्मा और उनके अंश रूप व्यष्टि देवगण निरेंद्रिय रह जाते, क्योंकि उनकी इंद्रियों का मोक्ष हो जाता। इसीलिए भगवान उनके दुख की निवृत्ति के लिए इंद्रियार्थ होकर अब छिप गए, उन्होंने अपना इंद्रियार्थ रूप हटा लिया। यही भगवान का 'हरित्व' है, यानी हरि रूप हो जाने से ब्रह्मा का उपकार ही हुआ, उनके दुख का हरण किया।
**जीव का कर्तव्य:** ब्रह्मा ने भगवान को हाथ जोड़े। हाथ जोड़ना ही जीव का विशेष हित है। भगवान यदि जीवों का उपकार करें तो जीवों को उसे अपनी अंजलि में ग्रहण करना चाहिए, यही जीवों का कर्तव्य है। असमर्थ जीव भगवान का प्रतिउपकार सेवा से कर सकता है। भगवान का स्वरूप देख लेना ही सबसे बड़ा उपकार है। अज्ञ जीवों पर भगवान कृपा करें और वे बेसमझी से निषेध न कर दें, यही उनका सत्कार्य है।
**ब्रह्मा का सर्वभूतमय स्वरूप:** भगवत् वचन का स्मरण रहने से ब्रह्मा अब सर्व जीवमय हो गए, देह और आत्मा दोनों सर्वभूतमय हो गए। भूत शब्द से प्रादुर्भाव मात्र लिया जाता है। जो-जो प्रादुर्भाव प्राप्त हो सकता है, तन्मय ब्रह्मा हो गया। अर्थात विश्व जड़-चेतनमय हुआ। या तो भगवान की आज्ञा से जितना कुछ जड़-चेतन जगत प्रकट हुआ, वह ब्रह्मा में प्रविष्ट हो गया, या ब्रह्मा ही वह रूप बन गए। ब्रह्मा उस समय ब्रह्म रूप ही हो गए और ब्रह्म रूप होकर उन्होंने स्वरूपभूता विश्व सृष्टि का निर्माण किया। ब्रह्मकल्प में आधिदैविक कारण से आधिदैविक कार्य ही प्रकाशित होता है, इसलिए इस प्राथमिक सृष्टि समय में ब्रह्मा आधिदैविक स्वरूप हो गए। तब वैषम्य और निंद्यपन नहीं हुआ, क्योंकि वह विश्व भगवत् स्वरूप ही था। भेद होने से ही वैषम्य और निर्गुणता के दोष आते हैं। अतः ब्रह्मा दर्शन के समय का हो गया और उसने जगत भी दर्शन के समय का ही बनाया। पूर्व में जब भगवान ने अपने दर्शन दिए थे, तब उन्होंने ब्रह्मा को आधिदैविक रूप दिया था। अब जगत बनाते समय भी वह पूर्ववत हो गया। ब्रह्माजी सृष्टि करते समय आधिदैविक स्वरूप हो गए। दर्शन में जैसा जगत भगवान ने रचा था, ब्रह्मा ने भी उसके सदृश विश्व रचना की।
**प्रश्न:** ब्रह्मा के निरेंद्रिय होने की आशंका का क्या तात्पर्य है?
**उत्तर:** इसका तात्पर्य यह है कि यदि भगवान साक्षात्कार इंद्रियों का विषय बनते रहते, तो इंद्रियों का मोक्ष हो जाता और सृष्टि प्रकट ही नहीं होती। इसलिए भगवान दुख की निवृत्ति के लिए इंद्रियार्थ होकर छिप गए, ताकि ब्रह्मा और उनके अंशभूत देवगण निरेंद्रिय न रह जाएं और सृष्टि का कार्य आगे बढ़ सके।
**प्रश्न:** 'पूर्व कल्प की तरह इस जगत को पैदा किया' का क्या अर्थ है?
**उत्तर:** 'पूर्ववत्' का तात्पर्य है कि जैसे पहले किया था, वैसा ही जगत बनाया। इसके दो संभावित विकल्प हैं: या तो भगवान ने पूर्व कल्प में जैसा जगत बनाया था, वैसा ब्रह्मा ने बनाया, अथवा ब्रह्मा ने पूर्व कल्प में जैसा बनाया था, वैसा ही बनाया। यह प्राथमिक सृष्टि होने के कारण ब्रह्माजी को प्रभु ने पूरा उपदेश दिया था, जिसका स्मरण करके उन्होंने वैसे ही सृष्टि की रचना की।
**प्रश्न:** ब्रह्मा का आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक रूप क्या है?
**उत्तर:** आधिदैविक रूप स्वयं ब्रह्माजी का है जिन्होंने सब कुछ किया। आधिभौतिक रूप वह जगत है जो प्रकट हुआ। आध्यात्मिक रूप वे देवता हैं जो जगत को नियंत्रित करते हैं। ब्रह्मकल्प में सब कुछ आधिदैविक ही होता है, और प्रभु ही उसके बनाने वाले होते हैं। ब्रह्मा उस समय ब्रह्म रूप होकर आधिदैविक स्वरूप हो गए थे, और आधिदैविक रूप होकर ही उन्होंने सृष्टि की रचना की।
**प्रश्न:** अंजलि में ग्रहण करने का क्या अर्थ है?
**उत्तर:** इसका अर्थ है कि प्रभु जो भी प्रेम से उपकार कर रहे हैं, उसे स्वीकारना। ब्रह्मा ने विहितांजलि होकर प्रभु के उपकार को ग्रहण किया, जो एक शिष्टाचार है।
श्लोक ३९ — ब्रह्मा द्वारा यम-नियमों का आचरण
• पाठ: श्रीमद्भागवत द्वितीय स्कन्ध, अध्याय ९, श्लोक ३९
• प्रतिभागी वाचन: (कोई प्रतिभागी वाचन नहीं)
• वक्ता विवेचन:
**प्रजाओं के कल्याण की इच्छा:** कार्य पर्यंत पहुंचा देने वाले भगवान के उपदेश का निरूपण करके, अब उस उपदेश के प्रचार का प्रकार बताते हैं। ब्रह्माजी ने विचार किया कि मैं जैसे प्रभु के उपदेश से कृतार्थ हुआ हूँ, वैसे ही सब प्रजा कृतार्थ हों। यह प्रजाओं का कल्याण चाहने वाले ब्रह्माजी का विचार था, किंतु उन्हें आशंका थी कि लोगों का वैसा अधिकार नहीं है, और ऐसा अधिकार प्राप्त कर सकें ऐसी उनकी शक्ति भी नहीं है।
**पितृ-कृत कर्म का फल:** 'यस्मिन जाते एतामि वपति' इस श्रुति से सिद्ध है कि पिता का किया कर्म पुत्रों को पहुँचता है। यह विचार कर, पुत्रों के कल्याण के लिए स्वयं ब्रह्मा ने यम-नियम किए।
**प्रश्न:** 'पितु कृत शास्त्र विहित धर्म ही पुत्रों को मिलता है, अन्य नहीं' – क्या ब्रह्मा के यम-नियम शास्त्र विहित नहीं थे?
**उत्तर:** सुबोधिनीजी में कहा गया है कि पुत्रों को केवल शास्त्र विहित धर्म ही मिलते हैं, अन्य नहीं, इसलिए दूसरा प्रकार कहते हैं। यह उदाहरण ब्रह्मा पर ठीक नहीं बैठता क्योंकि अभी प्रजा उत्पन्न ही नहीं हुई थी।
**पति-पत्नी का दृष्टांत:** जैसे पति का किया पत्नी के लिए प्राप्त होता है, उस तरह ब्रह्मा का यम-नियम अनुष्ठान प्रजाओं को मिलेगा, यह समझकर वे यम-नियम किए। परंतु यह नियम भी स्त्री के लिए है, अन्य के लिए नहीं, अतः एक और शंका उठती है।
**ब्रह्मा का धर्मपतित्व:** इस शंका का उत्तर देते हैं कि ब्रह्मा धर्म का भी नियामक है। अतः नियामक जिसे प्रेरणा करेगा, धर्म उसके पास ही जाएगा। इसलिए 'धर्मपति ही' कहा गया। ब्रह्माजी की प्रेरणा से धर्म प्रजाओं तक पहुँचेगा।
**'एकदा' का तात्पर्य:** 'एकदा' यानी एक दिन का अर्थ है जिस दिन निश्चिंत अवस्था थी, या भगवान के आशय जानने के लिए जब ब्रह्मदेव प्रचार का विचार कर रहे थे।
**यम-नियम का स्वरूप:** जल पीकर ही रह जाना इत्यादि यम हैं, और अहिंसा आदि नियम कहे जाते हैं। इंद्रिय, अंतःकरण आदि को नियम में रखना ही यम-नियम का तात्पर्य है। लौकिक क्रियाओं में प्रवृत्त इंद्रियों को रोककर वैदिक क्रिया कर देना, और अंतःकरण को भी लौकिक ज्ञान से हटाकर वैदिक ज्ञान में लगा देना, यही यम-नियम का काम है। यह सब ब्रह्मा ने प्रजाओं के लिए किया।
**'स्वार्थ काम्यया':** ब्रह्मा को इतना आग्रह क्यों हुआ, तो कहते हैं कि 'स्वार्थ काम्यया' - भगवत्-उक्त अपने प्रयोजन की इच्छा से। भगवान ने आज्ञा की थी कि 'मेरे मत का अवस्थान करना'। इस आज्ञा से भगवान के मत की अवस्थिति चारों ओर करनी चाहिए। अवस्थिति प्रचार से ही हो सकती है।
**प्रजापति का कर्तव्य:** जो अपने आश्रित की रक्षा न कर सके, वह पति ही नहीं। इस वाक्य के अनुसार, प्रजाओं को कृतार्थ न करें तो उसका स्वामित्व ही निरर्थक है। यह समझकर अपने स्वार्थ के लिए ही ब्रह्मा ने यम आदि का अनुष्ठान किया।
**प्रश्न:** ब्रह्मा के यम-नियम (जल पीकर रह जाना, अहिंसा) इतने सामान्य क्यों लगते हैं, ये कोई भारी भरकम चीज नहीं?
**उत्तर:** यह प्राथमिक सृष्टि थी, उस वक्त धर्म-अधर्म का कोई प्रचार नहीं था। ब्रह्माजी ने स्वयं आचरण करके बताया कि कैसे धर्म करना चाहिए। यम आंतरिक संयम है (जैसे जल पीकर रह जाना अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना), और नियम बाह्य संयम है (जैसे अहिंसा, दूसरों को कष्ट न देना)। इत्यादि शब्द का अर्थ है कि इसमें अन्य यम-नियम भी शामिल हैं।
**प्रश्न:** धर्मपति ही कहने से ही समाधान क्यों नहीं हो जाता, पुत्र और पत्नी के दृष्टांत क्यों दिए गए?
**उत्तर:** धर्मपति कहकर यह बताया कि धर्म उनके नियंत्रण में है और वे जिसे चाहें उसे धर्म का उपदेश कर सकते हैं। पूर्व के दृष्टांतों में शंकाएँ थीं (पुत्र न होना, पत्नी के लिए ही नियम होना)। धर्मपति होने के नाते, ब्रह्माजी की प्रेरणा से धर्म सृष्टि में प्रचारित होगा।
श्लोक ४० — नारद को भगवन्मत रूपी संपत्ति का दान
• पाठ: श्रीमद्भागवत द्वितीय स्कन्ध, अध्याय ९, श्लोक ४०
• प्रतिभागी वाचन: श्लोक ४० में बताया गया है कि ब्रह्माजी ने स्वयं भगवन्मंत्र का प्रचार नहीं किया, बल्कि उसे नारदजी को दिया।
• वक्ता विवेचन:
**नारद का अधिकारी होना:** सुबोधिनीजी के अनुसार, ब्रह्माजी ने स्वयं भगवन्मंत्र का प्रचार न करके उसे नारदजी को दिया। भगवान के मत को फैलाने के लिए नारदजी ही भगवन्मंत्र के प्रचार में अधिकारी हैं। शास्त्र में कहा है कि अपनी संपत्ति प्रिय पुत्र को देनी चाहिए। ब्रह्मा के पुत्रों में नारद ही ब्रह्मा को अति प्रिय पुत्र था।
**'रिवक्षा' का अर्थ:** संपत्ति के अधिकारी पुत्रों को 'रिवक्षा' कहते हैं। संपत्ति अनेक प्रकार की होती है, और यहाँ भगवन्मत रूपी संपत्ति सर्वोत्तम है। इस सर्वोत्तम संपत्ति को देने का सर्वोत्तम अधिकारी प्रियतम पुत्र नारद है।
**नारद की सेवा भावना:** नारद केवल अति प्रिय ही नहीं था, पर ब्रह्मा की आज्ञा पालन करने वाला सेवक भी था। स्वामी जो कहता है उसके अनुकूल सेवक करता है। इसलिए ब्रह्मा जो आगे करना चाहते हैं उस कार्य का साधक नारद ही है। शास्त्र में कहा है कि सेवारत को ही ज्ञान देना उचित है। सेवाकर्ता को ही ज्ञान सफल होता है।
**सेवा का स्वरूप:** सेवा स्वच्छंद नहीं होनी चाहिए, किंतु स्वामी के शील (स्वभाव) के अनुसार होनी चाहिए, जैसी स्वामी को रुचे। ऐसी सेवा अहंकार से की गई अच्छी नहीं कही जाती, किंतु विनय से नम्र सेवक से की गई सेवा ही फलप्रद होती है। इंद्रिय चपल सेवक को सेवा में शंका रहती है, जिससे स्वामी को प्रसन्नता नहीं होती, इसलिए इंद्रियों का दमन पूर्वक सेवा करनी चाहिए। मूल में 'च' दिया है, जिसका तात्पर्य है कि ब्रह्मा को प्रसन्न करने के साधन और भी स्तुति प्रवृत्ति नारदजी ने किए।
**प्रश्न:** 'अपने स्वभाव से की गई सेवा भी रोचक ही हो सकती है' इस पंक्ति का क्या अर्थ है?
**उत्तर:** इसका अर्थ यह है कि स्वच्छंद सेवा नहीं करनी चाहिए, बल्कि स्वामी के स्वभाव के अनुरूप सेवा करनी चाहिए। यदि सेवक ने स्वामी के स्वभाव को जान लिया है और अपने स्वभाव को भी उसके अनुरूप बनाया है, तो ऐसे शुद्ध स्वभाव से की गई सेवा भी स्वामी को रोचक ही होगी। यहाँ यह भी बताया गया है कि अहंकार से की गई सेवा अच्छी नहीं होती, किंतु विनय और नम्रता से की गई सेवा ही फलप्रद होती है।
**प्रश्न:** 'दायादों में नारद ही ब्रह्मा को अति प्रिय पुत्र था' में 'दायाद' का क्या अर्थ है?
**उत्तर:** 'रिक्ताद' या 'दायाद' शब्द का प्रयोग उन पुत्रों के लिए होता है जो पिता की संपत्ति के उत्तराधिकारी होते हैं। इसमें नारद ही ब्रह्मा को अति प्रिय पुत्र था। यानी, पिता की संपत्ति के उत्तराधिकारी जितने भी पुत्र हैं, वे सब 'दायाद' हैं, और उनमें सबसे अधिक योग्य नारदजी थे।