नवम अध्याय का संदर्भ
• पाठ: (कोई श्लोक संख्या नहीं)
• प्रतिभागी वाचन: श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कन्ध के नवम अध्याय का पारायण और चिंतन चल रहा है। इसमें अब तक चतुःश्लोकी भागवत का वर्णन देखा गया, जिसमें श्रीठाकुरजी ने ब्रह्मा जी को ज्ञान दिया। उसके बाद ब्रह्मा जी ने जगत की उत्पत्ति की। पिछले सत्र में ४०वें श्लोक में यह देखा गया कि नारद जी ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया।
• वक्ता विवेचन: (कोई विवेचन नहीं)
श्लोक ४१ — माया के स्वरूप की जिज्ञासा
• पाठ: श्लोक ४१
• प्रतिभागी वाचन: महामुनि नारद ने महेश भगवान विष्णु को जानने की इच्छा रखने वाले पिता ब्रह्मा को सब प्रकार से संतुष्ट किया। यहाँ माया को जानने की इच्छा ब्रह्मा को है या नारद को, इस पर भ्रम था।
• वक्ता विवेचन: **श्लोकार्थ की स्पष्टता:** श्लोकार्थ में 'जानने की इच्छा रखने वाले पिता ब्रह्मा' कहा गया है, लेकिन गुजराती में देखने पर स्पष्ट होता है कि माया को जानने की इच्छा नारद जी को है। इसे 'इच्छा रखने वाले नारद ने' ऐसा कर देने से अर्थ स्पष्ट हो जाता है। **सेवा का प्रयोजन:** नारद जी ने ब्रह्मा जी की सेवा पुत्र धर्म समझकर नहीं की, बल्कि अन्य कार्य के लिए की। उन्होंने भगवान की माया को समझने के लिए सेवा की। **माया का स्वरूप:** 'माये' पद संबंध का निर्देश करता है। यहाँ माया से तात्पर्य 'जगत कारणभूता सर्वभवन सामर्थ्यरूपा' शक्ति है, न कि मोहिनी माया। श्वेताश्वतर उपनिषद के वचन 'परास्य शक्तिर् विविधैव श्रूयते स्वाभाविक ज्ञान बल क्रिया च' के अनुसार भगवान की तीन प्रधान शक्तियाँ हैं: ज्ञान, बल और क्रिया। सृष्टि की उत्पत्ति के समय बल रूप सर्वभवन सामर्थ्य का उपयोग होता है, जबकि स्थिति और संहार में मोहिनी, ज्ञान और क्रिया शक्ति का उपयोग होता है। **माया और विश्वरूप:** नारद जी को स्मरण था कि भगवान माया के द्वारा ही विश्वरूप होते हैं। वक्ता के अनुसार, कभी भगवान माया को कारण रूप में ग्रहण करते हैं और कभी नहीं, परंतु दोनों प्रकार से जगत के पदार्थों में कोई फर्क नहीं आता। यह माया समझ में आ सकती है। **महामुनि नारद की योग्यता:** नारद जी ने भगवान की सहयोगिनी ज्ञान बल क्रिया रूपा माया को, निज अंश रूपा माया से मोह कराने वाली माया को, और दस लीला विभेद कराने वाली माया को जानने की इच्छा की। 'मायेसस्य' पद से माया की व्यवस्था करने वाले भगवान ही हैं, इसलिए माया को साधन बनाता है, यह कहा गया है। 'महामुनि' शब्द का तात्पर्य है कि नारद जी खूब मननशील हैं, मोहिनी माया के स्वरूप को जानते हैं, और उससे मुठभेड़ होने पर उसे दूर करने की शक्ति भी रखते हैं। मुनि केवल अपना हित जानता है, परंतु महामुनि दूसरों के परम हित को भी जानता है। नारद जी महाभागवत हैं, इसलिए दस लीलाओं को सुनने के अधिकारी भी हैं। 'पितरम' शब्द विश्वास के लिए आया है।
**प्रश्न:** नारद जी मोहिनी माया के स्वरूप को जानते थे, फिर विश्व मोहिनी पर क्यों मोहित हुए?
**उत्तर:** वक्ता ने स्पष्ट किया कि यह प्रसंग इस कल्प की कथा नहीं है, बल्कि कल्पांतर की कथा है। उस समय नारद के अंदर ये गुणधर्म प्रकट नहीं हुए थे। जैसे प्रथम स्कन्ध में नारद जी के पूर्व जन्म का चरित्र बताया गया, जिसमें उनका जन्म मनुष्य बालक के रूप में हुआ था, देवर्षि के रूप में नहीं। इसी तरह कल्पांतर में नारद का ऐसा भी स्वरूप रहा होगा, जिसमें भगवान ने उन्हें मोहित किया होगा। यह कथा पुराणांतर में वर्णित है। यह रामावतार के समय का प्रसंग नहीं है, जैसा कि प्रतिभागी ने कहा, बल्कि यह नारद के अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान की लीला थी। यह किसी अन्य कल्प में हुई घटना है और वह नारद भी कोई और हैं।
श्लोक ४२-४५ का पारायण
• पाठ: श्लोक ४२, ४३, ४४, ४५
• प्रतिभागी वाचन: नारद जी ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न पाकर वही प्रश्न ब्रह्मा से पूछे जो हम आप से पूछते हैं। जगतकर्ता ब्रह्मा ने अपने पुत्र नारद को भगवान द्वारा कहे गए दस लक्षण वाले भागवत नामक महापुराण को प्रसन्न होकर कहा। तेजस्वी श्री वेदव्यास मुनि जिस समय सरस्वती के तट पर पूर्ण परब्रह्म का ध्यान कर रहे थे, उस समय नारद ने वहाँ जाकर परब्रह्म का स्वरूप भागवत कहा। तुमने जो मुझसे पूछा है कि विराट पुरुष से यह जगत किस प्रकार हुआ, उन सबका मैं क्रमशः यथावत उत्तर देता हूँ।
• वक्ता विवेचन: (कोई विवेचन नहीं)
श्लोक ४२ — नारद की प्रश्न योग्यता
• पाठ: श्लोक ४२
• प्रतिभागी वाचन: 'निशम्य' पद में 'नी' और 'शम्य' दो पद हैं। 'शम्य' का अर्थ जानना और 'नी' का अर्थ अच्छी तरह है। अर्थात ब्रह्मा की प्रसन्नता अच्छी तरह जानकर ही नारद जी ने प्रश्न किया। यह मर्यादा सूचित करती है कि गुरु के प्रसन्न होने पर ही प्रश्न करना चाहिए। 'पितरम' पद पूछने की योग्यता बताता है, क्योंकि पुत्र पिता से सहज ही प्रश्न पूछ सकता है। 'लोकानां प्रप पितामह' से यह सूचित होता है कि नारद जी ने यह प्रश्न केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सब लोगों के कल्याण के लिए किया। 'पुत्र को पिता से सब कुछ सीखना चाहिए' इस वाक्य के अनुसार नारद जी ने समझा कि जब ब्रह्मा मुझे शिक्षा देंगे, तो मैं भी पुत्र प्राय प्रजाओं को सिखाऊंगा। 'देव ऋषि' कहने का तात्पर्य है कि नारद जी ने देवताओं के उपास्य मंत्रों का भी दर्शन किया है, वे ब्रह्मा के हृदय की गुण बात को नहीं समझेंगे, ऐसा विचार नहीं करना चाहिए। अर्थात उनकी सामर्थ्य अत्यंत उच्च है। 'परिपप्रच्छ' का अर्थ साधन सहित प्रश्न किया है। सुखदेव जी राजा परीक्षित जी से कहते हैं, 'हे राजन, जैसे तुमने मुझसे प्रश्न पूछा है, वैसे ही नारद जी ने भी ब्रह्मा जी से पूछा।' इसका अर्थ है कि परीक्षित के प्रश्न भी नारद के प्रश्नों के समान ही महत्वपूर्ण हैं।
• वक्ता विवेचन: **प्रश्नोत्तर:** 'परिपप्रच्छ' का अर्थ 'साधन सहित' प्रश्न है। सुखदेव जी राजा परीक्षित जी से कहते हैं कि, 'हे राजन, जैसे तुमने मुझसे पूर्व पक्ष रूप से पूछा है, वैसे नारद ने भी ब्रह्मा से पूछा।' 'भवान् यत् मनुच्छति' यानी 'आप जो मुझसे पूछते हो' वही प्रश्न नारद जी ने ब्रह्मा जी से पूछा था।
श्लोक ४३ — भागवत के दस लक्षण
• पाठ: श्लोक ४३
• प्रतिभागी वाचन: ज्ञान, वैराग्य और विचार तो पहले ही जान लिए थे, अब सब संदेहों को दूर करने वाला भक्ति विषयक तीसरा प्रश्न नारद जी ने पूछा। तात्पर्य यह है कि ज्ञान और वैराग्य के पश्चात अंतिम और सर्वोपरि साधन भक्ति ही है।
• वक्ता विवेचन: **भागवत की विशिष्टता:** दस लक्षण वाले अन्य भी पुराण हैं, जिनमें जगत के दस प्रकार कहे गए हैं, किंतु वे लोक में प्रसिद्ध हैं। वे यहाँ न समझे जाएँ, इसलिए 'भागवतम्' कहा। यह पुराण भगवान ने कहा है और भगवान का स्वरूप ही इसमें कहा गया है। **जगत के चार सिद्धांत:** 'भागवत' शब्द से प्रथम सिद्धांत कहा गया कि संपूर्ण भागवत साक्षात ब्रह्म है (वेदोक्त प्रथम सिद्धांत)। 'पुराण' शब्द से द्वितीय लौकिक सिद्धांत कहा गया कि ब्रह्म माया मिश्र है (पुराणोक्त द्वितीय सिद्धांत)। 'माया है' यह तृतीय सिद्धांत है, और 'केवल वाचनिक है' यह चतुर्थ सिद्धांत है।
**प्रश्न:** तृतीय और चतुर्थ सिद्धांत को 'सिद्धांत' क्यों कहा जाता है, जब ये शास्त्रों द्वारा सिद्ध नहीं लगते?
**उत्तर:** इदम कहकर तृतीय और चतुर्थ सिद्धांत की भी सूचना कर दी गई है। 'इदम' पद से अपने हृदयस्थ सिद्धांत का निर्देश किया। इससे यह दिखाया गया कि पूर्व चतुःश्लोकी में जो चार सिद्धांत कहे गए थे— प्रमाण, प्रमेय, विषय और उपपत्ति— उन्हें भी नारद से कह दिया गया है। **वक्ता परंपरा:** प्रमाण की शक्ति सिद्ध करने के लिए वक्ता परंपरा कहते हैं कि 'प्रोक्तं भगवता' अर्थात यह भागवत भगवान ने मुझसे कही थी। यदि कोई शंका करे कि यह परम समाधिगम्य ज्ञान भगवान ने ब्रह्मा से कैसे कह दिया, तो उत्तर है कि भगवान ब्रह्मा पर अत्यंत प्रसन्न थे और ब्रह्मा उनके पुत्र थे, इसलिए कहना आवश्यक था। **पिता का कर्तव्य:** नारद जी ने माया का स्वरूप जानने की इच्छा की थी, पर ब्रह्मा जी ने माया की लीला न कहकर सिद्धांत का कथन क्यों किया? 'पुत्राय' पद के उत्तर में कहा गया है कि यदि पुत्र अमार्ग पर जाता हो, तो निवारण करके सत्य मार्ग का उपदेश करना पिता का धर्म है। माया को जानने की अपेक्षा भगवत् तत्व का सिद्धांत जानना अधिक हितकर था। 'भूतकृत्' पद से यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा सब प्राणियों के कर्ता हैं, अतः नारद के द्वारा उसने सबके उपयोगी अर्थ का ही प्रकाश किया, क्योंकि प्राणियों के रचयिता होने के कारण उनका कर्तव्य था कि सबके हित की बात कहें।
श्लोक ४३ — भागवत के दस लक्षणों का विस्तृत विवेचन
• पाठ: श्लोक ४३
• प्रतिभागी वाचन: (कोई वाचन नहीं)
• वक्ता विवेचन: **जगत के चार सिद्धांत की व्याख्या:** 'अहं एवा समवाग्रे सदसत् परम्' जो चतुःश्लोकी का प्रथम श्लोक है, उसमें संपूर्ण जगत साक्षात ब्रह्म है, इस बात का निरूपण हुआ है। यह प्रथम सिद्धांत है कि जगत ब्रह्मरूप है। 'ऋते अर्थं यत् प्रति येत् आत्मनि आत्मन मायाम् यथा आभासः यथा तमः' यहाँ माया बताई गई है। विषय के अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीति हो रही है, उसे ब्रह्म की माया समझो। **द्वितीय सिद्धांत:** 'ब्रह्म माया मिश्र' यह अन्य पुराणों का सिद्धांत है। जब हमें विषय की भी प्रतीति होती है जो ब्रह्मरूप है और विषय के साथ-साथ विषय से अतिरिक्त जो ब्रह्म नहीं बना है ऐसे अहंता-ममतात्मक संसार की भी प्रतीति होती है, तो यह संसार मिश्रित ब्रह्मरूप विषय जगत की प्रतीति होती है। यह मिश्र प्रतीति है, जो पुराणों में वर्णित है। **तृतीय सिद्धांत:** 'मायिक है' यह तृतीय सिद्धांत है। जो अंश माया हमको प्रतीत कराती है, वह मायिक मिथ्या अंश है संसार। **चतुर्थ सिद्धांत:** 'वाचनिक है' यह चतुर्थ सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि जो हम संसार की अनुभूति करते हैं और संसार के संबंध में 'अहं मम' ऐसा जो कुछ भी हम बोलते हैं, उसका अस्तित्व केवल हमारे शब्दों में ही है। बाह्य जगत में उसकी कोई सत्ता नहीं है, यह केवल बोलने मात्र की बात है। **सिद्धांतों का निर्देश:** 'इदम' कहकर ब्रह्मा ने अंगुली दिखाकर 'यह वाला दस लक्षणम भागवतम् पुराणम् प्रोक्तम्' कहा, जो भगवान ने कहा था। यह दस लक्षण वाला भागवत पुराण अपने प्रिय पुत्र को कहा। महाप्रभु जी कहते हैं कि दस लक्षण वाले अन्य पुराण भी हैं, जो लोक में प्रसिद्ध हैं। परंतु ब्रह्मा वह भागवत बताना चाहते हैं जो भगवान ने उनको कही थी। **भागवत की अद्वितीयता:** 'भागवतम' कहा तो 'भगवत् स्वरूपम् प्रतिपाद्यम्' जो भगवान ने कहा और जिसका प्रतिपाद्य विषय भगवान है, वह भागवत पुराण है। **चतुःश्लोकी के चार विषय:** चतुःश्लोकी में प्रमाण, प्रमेय, विषय और उपपत्ति ये चार बातें थीं। इसमें से प्रथम सिद्धांत कहा गया। 'पुराण' लोकप्रतीति से सिद्ध होने से द्वितीय सिद्धांत भी कह दिया। 'इदम' शब्द से स्वयं को भी प्रतीति है, यह भी बताया। इससे चौथा सिद्धांत भी उन्होंने कह दिया, अर्थात् उपपत्ति। इस तरह चतुःश्लोकी में कहे गए चारों सिद्धांत श्रीभागवत में कह दिए गए हैं।
श्लोक ४४ — वेदव्यास की परम ब्रह्म ध्यान योग्यता
• पाठ: श्लोक ४४
• प्रतिभागी वाचन: श्लोक में आए विशेषणों (तेजस्वी, मुनि, पूर्ण परब्रह्म, ध्यायते) की कक्षा के अनुसार क्रम को समझना है। 'मुनि' सबसे कनिष्ठ योग्यता है।
• वक्ता विवेचन: **मुनि की योग्यता:** 'मुनि' की व्याख्या है कि 'मुनि यानी जो मननशील होते हैं और वो अपने आप को ही भगवान रूप से अपना उनका ध्यान करते हैं।' यानी 'अहम् ब्रह्मास्मि' इस प्रकार से जो मुनि का डेफिनेशन है, वह इस श्लोक में समझाया गया है। परंतु वेदव्यास जी केवल ऐसे मुनि नहीं हैं, बल्कि 'परब्रह्म ध्यायते'। **योग्यता का क्रम:** यहाँ चार विशेषण बताए गए हैं। मुनि सबसे निचली कक्षा का विशेषण है। उसके बाद 'परब्रह्म ध्यायते' जो आया है, वह उनसे ऊपर की कक्षा का है, क्योंकि वे अपने आप को ब्रह्म रूप मानकर ध्यान नहीं कर रहे हैं। व्यास जी में योग्यताएँ एक के बाद एक बढ़ती जा रही हैं। **भागवत कथा की परंपरा:** नारद जी ने व्यास जी को भागवत कही, इसका अर्थ यह है कि प्रेरणा दी। सरस्वती के तट पर व्यास जी द्वारा परब्रह्म का ध्यान करने का स्थान और प्रसंग प्रथम स्कंध में आ चुका है।
श्लोक ४५ — जिज्ञासा के प्रकार और समाधान
• पाठ: श्लोक ४५
• प्रतिभागी वाचन: इस प्रकार परंपरा के कथन द्वारा सब दोषों का परिहार करके प्रश्न रूप से जो पदार्थ पूछे गए थे, उनका निरूपण करने के लिए कहते हैं।
• वक्ता विवेचन: **दूषण रहित प्रश्न:** 'उत' का अर्थ है 'जो भी कुछ अर्थात दूषण को छोड़कर केवल प्रश्न रूप से पूछी बात'। यदि केवल प्रश्न रूप से पूछी बात हो तो भी उसका उत्तर देना चाहिए। राजा परीक्षित जी ने जो आक्षेप गर्भित प्रश्न पूछे थे, वह एक प्रकार से दूषण था, जिसका समाधान पहले हो चुका है। अब दूषण रहित, शुद्ध जिज्ञासा रूप से जो प्रश्न बचे हैं, उनका उत्तर आगे दिया जाएगा। **प्रश्नों के प्रकार:** पहले भी आठवें अध्याय में प्रश्नों के दो भेद बताए गए थे: एक 'आक्षेप' (सिद्धांत पर आपत्ति रूप प्रश्न) और दूसरा 'शुद्ध जिज्ञासा' रूप प्रश्न। आक्षेप गर्भित प्रश्न का उदाहरण है, 'जीव धातुओं से रहित है तो फिर उसके देह का आरंभ किस प्रकार हुआ', जिसका उत्तर माया द्वारा देह प्राप्ति के रूप में आया। शुद्ध जिज्ञासा रूप प्रश्न के उदाहरण हैं, 'जिस भगवान के नाभि कमल से लोक की स्थिति है, उनका स्वरूप कैसा है?', 'काल को कैसे पहचाना जाए?', 'ब्रह्मांड का आयुष परिमाण कितना है?', तथा 'जगत की उत्पत्ति, स्थिति, संहार करने वाले महेश भगवान अपने स्वरूप में कैसे स्थित रहते हैं?' इन शुद्ध जिज्ञासा रूप प्रश्नों का उत्तर आगे अध्याय १० में क्रमशः दिया जाएगा। इन प्रश्नों में भी सामान्य और विशेष रूप से दो प्रकार के भेद हैं।