मंगलाचरण
• पाठ: मंगलाचरण
• प्रतिभागी वाचन:
• वक्ता विवेचन:
श्लोक ४३ — शरीर और कर्मों का फल
• पाठ: सुबोधिनी श्लोक ४३
• प्रतिभागी वाचन: वे लोग जिन्होंने जीवन का स्थान प्राप्त कर लिया है मनुष्य शरीर धारण करके एक लोक से दूसरे लोक में विचरण करता है। कर्मों का फल भोगते समय हमेशा कर्म करते रहें।
• वक्ता विवेचन: **श्लोक ४३ की व्याख्या:** इस श्लोक में संघ के सभी दोषों की व्याख्या की गई है। पहले चार श्लोकों में शरीर की कमियों के बारे में बताया गया है, जो श्लोक ३२ से ४२ तक जीभ से निकलने वाली बातों और गर्भ से जुड़े अनुभवों के कारण होने वाले पापों से संबंधित था। अब इस श्लोक से शरीर के दोषों पर विचार किया जा रहा है। यदि कोई दोष महसूस होता है, तो श्लोक कहता है कि यह शरीर का दोष है, क्योंकि शरीर जीवित है।
**कर्मों का चक्र:** वक्ता कहते हैं कि आत्मा जिस शरीर को धारण करती है, उसके कारण मनुष्य एक संसार से दूसरे संसार में जाते हैं। कर्मों का फल भोगते समय वे हमेशा कर्म करते रहते हैं। यह सब शुरू से होता आ रहा है। श्लोक कहता है कि आत्मा ने अपना स्थान प्राप्त कर लिया है और जिस शरीर के निर्माण के कारण मनुष्य एक संसार से दूसरे संसार में प्रवेश करता है, उसी के सहारे वह आगे बढ़ता है। संसार में कर्मों के फल से निरंतर ग्रस्त रहना पड़ता है।
**तीन प्रकार के दोष:** वक्ता तीन ऐसी बातें बताते हैं जिनसे जीव संतुष्ट हो जाएगा, भले ही वह ऐसा करने पर भी कर्म करता रहे। कर्म उत्पन्न करने वाले तीन प्रकार के दोष होते हैं: पहला, एक ही स्थान पर न होना या फिर लगातार एक दुनिया में भटकना; दूसरा, कर्म का फल भोगते समय भी कर्म करना, जिससे मुक्ति नहीं मिलती; और तीसरा, कर्म का कारण बनने वाले शारीरिक दोष। ये तीनों दोष शरीर की कमियां हैं। इस संसार में पुनर्जन्म का एकमात्र कारण कर्म ही है।
**गति की त्रुटि:** वक्ता स्पष्ट करते हैं कि शरीर धारण करने के कारण आत्मा लगातार भटकती रहती है, दुनिया में बहुत से लोग आते-जाते रहते हैं। इसीलिए गति की त्रुटि इस श्लोक में वर्णित है।
श्लोक ४४ — जन्म, मृत्यु और भाव विकार
• पाठ: सुबोधिनी श्लोक ४४
• प्रतिभागी वाचन: महान प्राणी, इंद्रियाँ और मन, शरीर के समान, आत्मा का अनुसरण करता है। अवरोध ही इसकी मृत्यु है और इसका प्रकटीकरण ही इसका जन्म है।
• वक्ता विवेचन: **श्लोक ४४ का महत्व:** वक्ता कहते हैं कि श्लोक ४४ बहुत महत्वपूर्ण है और पुरुषोत्तमजी की टिप्पणी कठिन है, इसलिए वे इसे मूल से पढ़ेंगे। उन्होंने बताया कि इस श्लोक को समझने के लिए बहुत बार पढ़ना पड़ता है।
**आत्मा और शरीर के दोष:** श्लोक ४३ में दिखाए गए तीन दोष—अपने कर्मों के परिणामों को भुगतना, कष्ट भोगते हुए भी पुण्य कर्म करना, और एक काम से दूसरा काम उत्पन्न होना—ये सभी जीव को शरीर के अधीन कर देते हैं। श्लोक ४४ में कहा गया है कि आत्मा को इस शरीर का त्याग करना पड़ता है और वह वश में हो जाती है।
**मृत्यु और जन्म का स्वरूप:** सुबोधिनीजी में मृत्यु को मृत्यु और पुनर्जन्म को अभिव्यक्ति कहा गया है। पंचतत्व, इंद्रियां और मन आदि आध्यात्मिक तत्व हैं। चेतना के बिना शरीर शक्तिशाली नहीं होता। इसका कोई अभिभावक नहीं है, इसलिए यह जीवन का सचेत रूप है। यह विषय उपयुक्त है कि जल निकाय को जीवित प्राणियों की आवश्यकता होती है।
**जन्म और मृत्यु का पाप:** जन्म और मृत्यु पाप के कारण हैं, और इनकी रोकथाम भी पाप का कारण है। मृत्यु की मृत्यु को शब्दों में व्यक्त किया गया है, और इसमें बाधा शरीर की ही है। आत्मा की मृत्यु का अर्थ है 'नित्राम' यानी पूर्ण अवरोध, जो अपने ही जैसे लोगों के प्रवाह को रोकता है। प्रवाह उत्पन्न नहीं होना चाहिए, इसलिए प्रवाह अब उत्पन्न नहीं होता है। मृत्यु का स्वरूप यह दर्शाता है कि प्रवाह की उत्पत्ति ही मृत्यु का एक रूप है।
**भाव विकार और उत्पत्ति:** वक्ता कहते हैं कि जन्म के बाद एक और परंपरा का जन्म होता है। इसमें फुटनोट नंबर दो में बताया गया है कि शरीर कमजोर है, और जब ऐसा होता है, तो इसका प्रवाह उत्पन्न करना आवश्यक होता है। अतः धारा का स्रोत बंद है। रूप की विशेषता को छह भाव विकार कहा जाता है: जन्म (होना), परिवर्तन (परिणाम), वृद्धि, क्षय, और विनाश।
**प्रवाह और विरोध:** उत्पत्ति का प्रवाह दो प्रकार का होता है। 'होना' और 'परिवर्तन' प्रवाह के उद्गम का विरोध नहीं करते, क्योंकि यह वस्तुओं से संबंधित नहीं है, बल्कि दूसरे रूप में यह वही पदार्थ है। उदाहरण के लिए, एक बच्चे का रूप अलग होता है और किशोरावस्था में अलग, लेकिन मूल स्वभाव एक ही रहता है। इसलिए मूल के भीतर कोई विरोध नहीं है।
**वृद्धि और क्षय में विरोध:** 'वृद्धि' और 'क्षय' दो अलग-अलग विकार हैं। ये धारा के विपरीत जाते हैं और धारा के अनुरूप ढलते हैं, क्योंकि यह मूल के विरुद्ध है। वृद्धि का अर्थ है अस्तित्व का जन्म जो विद्यमान है, यह आगे बढ़ता है, लेकिन पीछे नहीं हटता। क्षय का अर्थ है विनाश की ओर अग्रसर होना। ये दोनों धारा के विपरीत हैं।
**काल का सूक्ष्म प्रभाव:** पुरुषोत्तमजी कहते हैं कि 'अंग हमेशा बढ़ते रहते हैं' वाली कहावत के अनुसार, कल (समय) के कारण होने वाले पदार्थ का प्रवाह हमेशा यहीं से उत्पन्न होता है। यह एक और परंपरा है जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देती। काल के कारण शरीर में होने वाले परिवर्तन सूक्ष्म होते हैं, जैसे इत्र का प्रभाव, जो सीधे दिखाई नहीं देता। ज्ञान और कर्म तथा पिछली बुद्धि भी इसके भाग हैं, और अन्य गुणों से सहायता मिलती है।
**उत्पत्ति का अंत:** मृत्यु ऐसे जन्म का अंत है जब उत्पत्ति बंद हो जाती है। 'अनिरोधसमा' शब्द का अर्थ है निरोध। निरोध का अर्थ है समरूप पदार्थ के प्रवाह को रोकना। यह हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति का प्रवाह है जो हमारे भीतर मौजूद है। यदि यह धारा उत्पन्न करता है तो इसे जन्म कहते हैं, लेकिन यदि इससे प्रवाह उत्पन्न नहीं होता है तो उसे मृत्यु कहते हैं, जिसका अर्थ है प्रवाह का रुक जाना।
**सूक्ष्म मृत्यु और जन्म:** वक्ता आधुनिक शरीर क्रिया विज्ञान का उदाहरण देते हैं कि दिल धड़कना बंद करने पर भी शरीर के कई हिस्से कुछ घंटों तक जीवित रहते हैं। मृत्यु तब होती है जब सब कुछ पूरी तरह से बंद हो जाए और समरूप सूक्ष्मजीवों का प्रवाह रुक जाए। जन्म और मृत्यु भ्रम के चक्र में पहले और अंतिम चरण हैं, और मध्यवर्ती अवस्थाएँ प्रक्रिया का जारी रहना दर्शाती हैं।
**काल, कर्म और प्रकृति की श्रेष्ठता:** आचार्य चरण ने कहा कि काल का कर्म और प्रकृति से श्रेष्ठ होना, यही अधिक बलवान है। शरीर के तत्वों का विघटन और चयापचय कर्म और प्रकृति के नियंत्रण में होते हैं। यदि काल मजबूत हो तो वह दोनों को अपने वश में कर लेता है, और पाप तथा मृत्यु की व्यवस्था भी व्यवस्थित हो जाती है।
**जन्म का प्रकटीकरण:** प्रत्यक्ष जन्म ही ज्ञानोदय की सीमा है। शरीर की अभिव्यक्ति का अर्थ है अभिव्यक्ति। किसी जीव का जन्म उत्पत्ति कहलाता है। जिस शरीर में जीव जन्म लेता है वह एक ही होता है। सभी वस्तुएं ईश्वर के स्वरूप में विद्यमान हैं, और जब तक ईश्वर वस्तुओं को प्रकट करते हैं, वे एक निश्चित समय के लिए दिखाई देते हैं। जब शरीर तर्कशक्ति में प्रवेश करता है, तो यह प्रकट होता है। प्रभु का शरीर प्रकट हुआ है, और जीवित प्राणी मेरे हैं। यह समय-समय पर प्रकट होता रहता है।
**देह का पुनः प्रकट होना:** फुटनोट सात में कहा गया है कि पहले कभी भगवान का अस्तित्व नहीं था और फिर ऐसा प्रतीत होता है कि इसे इस प्रकार बनाया गया था। वक्ता कहते हैं कि शरीर दोबारा क्यों प्रकट होना चाहिए, यह संदेह पैदा होता है। शरीर से उस अंग को हटा देना जिसका अस्तित्व नहीं था, शरीर का अभाव है। ऐसा होता नहीं है, लेकिन एक बार यह कारण में प्रवेश कर जाता है और फिर वही चक्र, जन्म और मृत्यु का। यदि यह सफल होता है तो यह अपना शरीर पुनः प्रकट कर लेता है। जब ईश्वर की इच्छा होती है, जीव का जन्म होता है। जब यह मौजूद नहीं होता, तो यह उसी समय प्रकट होता है, यानी, यह मरता है और फिर से जन्म लेता है। यह फिर से उसी कारण में प्रवेश करता है। यदि प्रभु की इच्छा से वह शरीर को प्रकट करे, तो उद्भव की संभावना यही है कि इसका उद्भव ही जन्म है। समस्त अस्तित्व का मूल अस्तित्व की संभावना में निहित है। यहां जिस शरीर को परित्यक्त होने का अहसास होता है, वही शरीर है। जीवन को भी संभावना या उत्पत्ति कहा जाता है। जब स्वयं प्रभु उसी तत्व के होते हैं, तो यह इन सभी चीजों का मिश्रण होता है, और वांछित शरीर बार-बार प्रकट होता है।