॥ सुबोधिनी_हिंदी_२/१०/२ ॥

श्रीवल्लभाचार्य विद्यापीठ, हालोल — नित्य पुष्टिस्वाध्याय
📅 28 September 2026
⚠ ⚠ यह विवरण AI द्वारा स्वतः निर्मित है। किसी भी असंगति की स्थिति में कृपया सम्बन्धित वीडियो देखें। This description is AI-generated. Please refer to the linked video for any discrepancy.

परिचय एवं सन्दर्भ

यह सत्र श्रीमद्भागवत सुबोधिनी ग्रंथ के द्वितीय स्कंध, दसवें अध्याय के द्वितीय श्लोक पर केंद्रित है। वक्ता इस श्लोक के माध्यम से श्रीमद्भागवत में वर्णित दस पदार्थों – सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वंतर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय – की गहन व्याख्या कर रहे हैं। विशेषतः, आश्रय को परम लक्ष्य और अन्य नौ को उसके लक्षण के रूप में समझाकर, शास्त्र में अनेक प्रतिपाद्य विषयों की शंका का समाधान किया गया है।

YouTube सुबोधिनी_हिंदी_२/१०/२ 📹 पूरा वीडियो
१
श्लोक २ — दशम आश्रय की विशुद्धि और नव लीलाओं का लक्षण
००:०० – १:०१:०९ — श्लोक २ — दशम आश्रय की विशुद्धि और नव लीलाओं का लक्षण
श्लोक २ — दशम आश्रय की विशुद्धि और नव लीलाओं का लक्षण
पाठ
सुबोधिनी श्लोक २
प्रतिभागी वाचन
  • श्रीमद्भागवत का संदर्भ: श्रीमद्भागवत शास्त्र में कुल 12 स्कंध हैं। प्रथम स्कंध में अधिकार लीला (अधिकारिता, मध्यम अधिकारिता, उत्तम अधिकारिता) का वर्णन है। द्वितीय स्कंध में साधन लीला (10 अध्याय, तीन प्रकरण: तत्व ध्यान, रत प्रसाद, विमर्श) का वर्णन है। पहले दो अध्याय में तत्व ध्यान का निरूपण (प्रथम में स्थूल, द्वितीय में सूक्ष्मतम स्वरूप) है। तीन और चार अध्याय में ह्रदय की सहज प्रसन्नता (रत प्रसाद) का वर्णन है, जिसमें तृतीय में श्रोता की श्रद्धा और चतुर्थ में वक्ता की श्रद्धा का निरूपण है।
  • द्वितीय स्कंध में विमर्श प्रकरण: पाँच से दस अध्याय में विमर्श प्रकरण का निरूपण है, जिसमें उत्पत्ति का विचार (पाँच से सात) और उपपत्ति का विचार (आठ से दस) बताया गया है। पाँचवें अध्याय में 14 लोक की रचना का हेतु, महत, अहंकार, पाँच तन मात्रा, पाँच ज्ञानेंद्रिय, पाँच कर्मेंद्रिय, पंचमहाभूत, ब्रह्म की उत्पत्ति के कारण तत्व का निरूपण है।
  • उत्पत्ति और उपपत्ति का संबंध: मूल स्वरूप में भजन सिद्ध होने पर भगवान के देश काल दोनों में अपरिछिन्न होने का कारण और भगवान का प्राकट्य रूप का वर्णन है। उपपत्ति के मनन के तीन अंग हैं: आठवें अध्याय में आसन का गर्भित प्रश्न, नौवें अध्याय में उसका उत्तर, और दसवें अध्याय में फल का निरूपण कि भगवत् श्रवण ही फल है।
  • दशम अध्याय में लीलाओं का निरूपण: नौवें और दसवें अध्याय की संगति में नौवें अध्याय में ब्रह्मा के उपदेश में भगवान ने प्रमाण, प्रमेय, विषय और शिक्षा इन चार पदार्थों का निरूपण किया था। तृतीय विषय को छोड़कर बाकी तीन पक्षों का श्रुति आदि में निरूपण सिद्ध है। इसलिए यहाँ भगवत् रूप जगत और उसकी 10 अलौकिक लीलाओं का निरूपण स्वरूप और लक्षण कहते हैं, जैसा कि प्रथम श्लोक 'अत्र सर्ग विसर्गस स्थान पोषण उतानु कथा निरोध मुक्ति आश्रय' में कहा गया है।
  • समष्टि रूप ब्रह्म की व्यवस्था के अनुसार लीलाएँ: सर्ग (व्यापक परब्रह्म का पुरुष शरीर स्वीकारना), विसर्ग (पुरुष द्वारा ब्रह्मादि की उत्पत्ति), स्थान (उत्पन्न भय की मर्यादा का पालन), पोषण (मर्यादा स्थिति की अभिवृद्धि), ऊति (पुष्टकीय के सत असत वासना अनुसार आचरण), मन्वंतर (आचरणों में सदाचार), ईशानुकथा (सदाचार में भगवान की भक्ति), निरोध (भक्तों में प्रपंच की विस्मृति और भगवत् आसक्ति), मुक्ति (निष्प्रपंचों को भगवत् रूप का लाभ), और आश्रय (मुक्तों का ब्रह्म रूप से स्थित होना)।
  • व्यष्टि रूप जगत के प्रत्येक पदार्थों में लीलाएँ (अन्वयी और व्यतिरेक): लीलाएँ पाँच प्रकार की अन्वयी और पाँच प्रकार की व्यतिरेक भी हैं। अन्वयी में: सर्ग (प्रत्येक घट आदि पदार्थ में कारण रूप भगवान की अव्यक्त स्थिति), विसर्ग (हर कारण में कर्ता रूप कार्य का पहले से विद्यमान होना), स्थान (पदार्थ के स्वरूप और मूल नियमों का होना), पोषण (पदार्थों में कार्य सिद्धि के लिए भगवान का प्रवेश), ऊति (ब्रह्मज्ञानी को प्रतीति कराने के लिए भगवान की लीला)। व्यतिरेक में: मन्वंतर (भगवान का कारण और कार्य दोनों से पृथक रहना; वेदादि मर्यादा से कुछ अधिक रूप), ईशानुकथा (पुष्टि भक्ति का विषय बनके लौकिक वैदिक से व्यतिरिक्त रूप), निरोध (लौकिक वैदिक में आसक्ति छोड़कर अपने स्वरूप में आसक्त होना), मुक्ति (निरुद्ध जीव में जीव भाव आदि सबका त्याग), और आश्रय (पूर्वोक्त नौ प्रकार के स्वरूपों का आधार)।
  • 'दशमस्य विशुद्धम् नवा नाम इह लक्षणम्' की व्याख्या: दशम आश्रय को ढूंढकर निकाल लेने के लिए श्रीमद्भागवत में दशम आश्रय है। उसको किसी नियत विशेष द्वारा पहचानना ही उसकी विशुद्धि है। दश पदार्थों में मुख्य प्रतिपाद्य विषय आश्रय है, और बाकी नौ उस आश्रय के लक्षण तथा उपपादक हैं। जगत में सभी पदार्थ भगवत् रूपी हैं और उनमें भगवत् रूप दस धर्म रहते हैं। विशुद्धि का अर्थ है इन धर्मों या विशेषों में ही पदार्थ की पहचान होती है। उसमें एक ग्राह्य है और बाकी त्याज्य हैं। आश्रय को ही ग्रहण करना पहचानना है। यदि बाकी नौ पदार्थों का निरूपण न किया जाए तो किसको लेना और किसको छोड़ना यह शोध ही न हो सके। अतः आश्रय को पहचानने के लिए नियम करना पड़ता है कि जहाँ तक प्राकृत गुणों का संबंध मालूम पड़े, वहाँ तक वह पदार्थ त्याज्य है। यदि गुण से भी संबंध रखें तो भगवान के आश्रय में व्यभिचार दोष होगा। मूल लक्ष्य आश्रय है, जो लक्षण आश्रय तक ले जा रहे हैं वही अभीष्ट और ग्राह्य हैं। बाकी त्यागने योग्य हैं।
  • लक्षणों का महत्व: सर्ग आदि नौ आश्रय के एक के पीछे एक धर्म हैं। सबसे पीछे जो बाकी रहता है, वही ग्रहण करने योग्य है। जैसे गहू को तुष आदि ढकते हैं, वैसे ही ये धर्म भी आश्रय को ढकने वाले हैं। इनका निरूपण हो जाने पर आश्रय दूसरे पदार्थों से स्पष्ट और शुद्ध निरूपित और पहचाना जाता है। इसलिए नौ धर्मों के लक्षण का निरूपण करना उचित है। 'लक्षणम्' का अर्थ असाधारण धर्म है जो दूसरे से भिन्नता दिखाए। लक्षण कभी संपूर्ण स्वरूप का ज्ञान नहीं देते; स्वरूप तो आगे स्कंधों के निरूपण में समझ पाएँगे।
  • प्रमाण और प्रमेय का विवेचन: 'वर्णयंती महात्मान श्रुतेन अर्थेन' को समझाते हुए आचार्यजी कहते हैं कि इनका यही लक्षण है। इसमें प्रमाण क्या है? बड़े लोग वर्णन करते हैं, यह इसका प्रमाण है। ये लक्षण भगवान के हैं, इसलिए इनका वर्णन कोई शूद्र नहीं कर सकता। 'महात्मान' का अर्थ है, जिसका अंतःकरण बड़ा है, जिसके अंतःकरण में भगवत् चरणाविंद का महात्म विक्रम होता है। ऐसे लोग ही भगवान के स्वरूप को जान लेते हैं। यहाँ प्रश्न उठाया गया कि प्रमेय का बल तो दिख रहा है, प्रमाण का बल कहाँ है? उत्तर में 'श्रुतेन अर्थेन' से प्रमाण की बात चालू होती है। वेदांत के अनुसार सहज में वेदादि शास्त्रों में कहे सभी पदार्थ भगवत् रूपी हैं, जैसा कि कठोपनिषद में 'सर्ववेदा यत पदं आमनंति' और तैत्तिरीय आरण्यक में 'शुक्राणि यत्र एक भवंति सर्वे होतारो यत्र एक भवंति' वचनों से सिद्ध होता है कि सभी जीव ब्रह्म में एक बोध कराए गए हैं, और ब्रह्म ही सबका एकमात्र आश्रय है। अनुग्राहक जीव, प्रमाण, और प्रमेय तीनों को एक आश्रय भगवान में ही समाप्ति दी गई है। इसलिए प्रमाण भी भगवत् बल से निरूपण में बलवान होता है। जहाँ अनुग्राहक, प्रमाण और प्रमेय वस्तुएँ अंत में एक हो जावे, वही आश्रय है।
  • नव लीलाओं का प्रमेय, प्रमाण और अनुग्राहक (जीव) रूप लक्षण:
  • सर्ग, विसर्ग, स्थान (प्रमेय रूप लक्षण): पुरुषोत्तमजी कहते हैं कि जैसे सत्व, रज, तमस एक दूसरे में प्रवेश करके नव हो जाते हैं, वैसे ही अनुग्राहक, प्रमाण और प्रमेय एक दूसरे में प्रवेश करके नवधता हो रही है। सर्ग, विसर्ग, स्थान प्रमेय रूप लक्षण हैं, क्योंकि शुक्र शब्द में वस्तुजात का कारण कहा है और सबका कारण प्रमेय रूप भगवान ही प्रधान हैं।
  • पोषण, ऊति, मन्वंतर (प्रमाण रूप लक्षण): पोषण, ऊति, मन्वंतर प्रमाण रूप लक्षण हैं, क्योंकि वेदोक्त ज्ञानी इसमें प्रधान हैं।
  • ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति (जीव जाति लक्षण): ईशानुकथा, निरोध और मुक्ति जीव जाति लक्षण हैं, क्योंकि भक्त, निरुद्ध और मुक्त तीनों जीव जात हैं।
  • नव लीलाएँ उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय रूप में:
  • उत्पत्ति (सर्ग, विसर्ग, स्थान): पंचमहाभूत आदि कारणों से (सर्ग), उनके गुण रूप कार्य से (विसर्ग), और आधार रूप भगवान से (स्थान) उत्पत्ति होती है। पुरुषोत्तमजी शंका उठाते हैं कि भगवान लक्ष्य रूप हैं तो यहाँ लक्षणतया क्यों? समाधान में कहते हैं कि अवस्था भेद के कारण कोई समय पर भगवान लक्षण हैं और कोई समय पर वही लक्ष्य हैं, जैसे कपास का उदाहरण दिया जाता है।
  • स्थिति (पोषण, ऊति, मन्वंतर): अनुग्रह से (पोषण), विलास रूप वासना से (ऊति), और सधर्म से (मन्वंतर) स्थिति होती है। ये तीनों ज्ञान प्रधान हैं। पोषण (अनुग्रह) वेदोक्त ज्ञानजन्य है, ऊति (वासना) ज्ञानजन्य पूर्व स्मृति है, और मन्वंतर (सधर्म) सतयुग त्रेता युग में सनातन धर्म की मर्यादा के लिए मनु, इंद्र आदि के रूप में भगवान का अवतारित होना है।
  • प्रलय (ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति): अहंता ममता रूप संसार का प्रलय भक्त और भगवत् कथा रूप भक्ति से (ईशानुकथा) होता है। जीव देह का प्रलय निरोध है, और जीवत्व का प्रलय भक्ति या मुक्ति है।
  • निष्कर्ष: वेदांत के अनुसार और वेदोक्त ज्ञान साधन युक्ति ही महात्मा लोग इन सर्ग आदि का वर्णन संपूर्ण रीति से और सरलता से, क्लिष्ट कल्पना से नहीं, अपितु वेद के अनुरूप युक्ति से करते हैं।
वक्ता विवेचन
  • वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: थोड़ी देर के अंतराल के बाद श्रीभागवत सुबोधिनी, द्वितीय स्कंध, दसवें अध्याय का दूसरा श्लोक आरंभ किया जा रहा है।
  • प्रश्न: श्रीमद्भागवत में दस पदार्थों के निरूपण की आवश्यकता क्यों है? एक शास्त्र में तो एक ही प्रतिपाद्य विषय हो सकता है, अनेक नहीं।
  • उत्तर: मुख्य प्रतिपाद्य विषय तो आश्रय ही है, बाकी नौ उसके लक्षण हैं। यदि नौ पदार्थों का निरूपण न किया जाए तो आश्रय को पहचानना संभव नहीं होगा। उन नौ को समझना पड़ता है ताकि आश्रय की विशुद्धि हो सके।
  • वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: आचार्यजी पुरुषोत्तमजी ने कहा है कि क्लिष्ट कल्पना से नहीं, बल्कि वेद के अनुरूप युक्ति से वर्णन किया गया है। यह श्लोक समझने का प्रयास किया गया है। यहाँ पर प्रथम और द्वितीय श्लोक का विवेचन पूर्ण होता है।
२
प्रश्नोत्तर — ग्राह्य और त्याज्य का विवेक तथा ९ लीलाओं का स्वरूप
१:००:१६ – १:५८:३९ — प्रश्नोत्तर — ग्राह्य और त्याज्य का विवेक तथा ९ लीलाओं का स्वरूप
प्रश्नोत्तर — ग्राह्य और त्याज्य का विवेक तथा ९ लीलाओं का स्वरूप
पाठ
(कोई विशेष श्लोक नहीं)
वक्ता विवेचन
  • प्रश्न: पहले कहा गया कि एक ही ग्राह्य है और बाकी त्याज्य हैं, लेकिन फिर सभी को प्रभु की लीला और प्रभु के धर्म बताया गया है। अगर सब प्रभु के धर्म हैं और वे आश्रय को ढकते भी हैं, तो त्याज्य की बात क्यों की जा रही है? यह स्पष्ट नहीं हो रहा है।
  • उत्तर: जो पदार्थ हमें अनुभूत होते हैं, वे सब भगवत् रूपी हैं और उनमें दस धर्म रहते ही हैं। हमें ग्राह्य-अग्राह्य का विवेक रखना पड़ेगा। आदि भौतिक से आदि दैविक की ओर जाते हुए आदि भौतिक को त्याज्य करेंगे और आदि दैविक लीला में जाएंगे। लोकाश्रय को प्रभु ही बने हुए हैं, परंतु वेदाश्रय के संदर्भ में लोकाश्रय ग्राह्य है। भगवत् आश्रय पर जा रहे हैं तो वेदाश्रय भी त्याज्य है। जो गुणातीत परब्रह्म लक्ष्य के पास जाने के लिए उपयोगी है, वही ग्राह्य है, बाकी त्याज्य। यदि हम गुण से भी संबंध रखें तो भगवान के आश्रय में व्यभिचार दोष होगा। कृष्णाश्रय में धर्म के छह अंग बताए हैं, और कृष्णाश्रय का ही मुख्य तात्पर्य है। सब कुछ प्रभु बने हुए हैं तो भी ग्राह्य और त्याज्य का विवेक यहाँ करना पड़ेगा।
  • वक्ता का अतिरिक्त स्पष्टीकरण: दशमस्य विशुद्धम् नवा नाम इह लक्षणम् - दशम यानी आश्रय की शुद्धि के लिए ये नौ के लक्षण यहाँ कहे गए हैं। लक्षण का काम है लक्ष्य को समझाना, इंडिकेट करना। यदि हम लक्षण में उलझ जाएँ, तो लक्ष्य लक्षित नहीं होगा। जैसे गाय के उदाहरण में, प्राणी, चौपाया, सींग वाला पशु आदि उसके लक्षण हैं। इन सबको हटाकर केवल गाय को समझना है। लक्षण का काम ही व्यावर्तन करना है। सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण आदि लीलाएँ भी भगवान की ही हैं, परंतु यदि हम उनको ही स्वरूप मान लेंगे तो परमब्रह्म ढँका रह जाएगा, जैसे गेहूं छिलके के भीतर दबा होता है। इन नौ लीलाओं को समझना पड़ेगा ताकि आश्रय स्पष्ट हो। एक बार जब इन सबका आश्रय वह है, यह स्पष्ट हो गया, तो पीछे इन छिलकों को उतारने की ज़रूरत नहीं है। तब बिना उतारे भी आपको वह बात समझ में आ सकती है। यह तो ज्ञान कराने के लिए जब लक्षण मुख से कोई बात कही जा रही है, तब लक्षण में हम उलझ न जाएँ, उससे जो लक्षित किया जा रहा है उसको हमें समझना है, इस अभिप्राय से यहाँ आचार्य चरण यानी भागवतकार समझा रहे हैं।
३
प्रश्नोत्तर — प्रमेय, प्रमाण और जीव-जाति का ९ लीलाओं से संबंध
१:५८:३९ – २:००:३९ — प्रश्नोत्तर — प्रमेय, प्रमाण और जीव-जाति का ९ लीलाओं से संबंध
प्रश्नोत्तर — प्रमेय, प्रमाण और जीव-जाति का ९ लीलाओं से संबंध
पाठ
(कोई विशेष श्लोक नहीं)
वक्ता विवेचन
  • प्रश्न: पहले बताया कि सर्ग, विसर्ग, स्थान प्रमेय रूप लक्षण हैं; पोषण, ऊति, मन्वंतर प्रमाण रूप लक्षण हैं; और ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति जीव जाति लक्षण हैं। ये कैसे हैं, विशेषकर प्रमाण रूप लक्षण और जीवत्व का प्रलय ही भक्ति/मुक्ति कैसे है?
  • उत्तर: प्रमेय का मतलब तत्व होता है। तत्वों की उत्पत्ति ही सर्ग, विसर्ग और स्थान में कही गई है, तो उस दृष्टि से इनको प्रमेय रूप लक्षण कहा है। यानी इन तीन लीलाओं से भागवत का प्रमेय रूप लक्षण निरूपित हुआ है। प्रमाण रूप लक्षण (पोषण, ऊति, मन्वंतर) का मतलब है कि यह प्रमेय वही है। इस बात को सिद्ध करने वाली लीलाएँ ये तीन हैं, क्योंकि इन्हीं लीलाओं में भगवान ने अपने अवतार रूपों और सामर्थ्य को दिखाया है, जिससे यह कोरिलेट हो सके कि ये प्रमेय वही है और ये प्रमेय का प्रमाण ये है। पोषण माने अनुग्रह, जो वेदोक्त ज्ञानात्मक होने से वेद के बोध के वचन वहाँ होते हैं। ईशानुकथा, निरोध और मुक्ति जीव का लक्षण है, यानी उनकी मुक्ति का प्रकार बताया जा रहा है। प्रलय अहंता ममता रूप संसार का प्रलय भी भक्त और भगवत् कथा रूप भक्ति से होता है (ईशानुकथा)। जीव देह का प्रलय ही निरोध है। जीवत्व का प्रलय ही मुक्ति है। निरुद्ध जीव जीवन मुक्त हो ही गया है, उसे केवल प्रारब्ध जन्य आयु समाप्त होने का इंतजार है। जब ब्रह्म में प्रवेश हो जाएगा तो जीव का भी लय हो जाएगा। इस प्रकार अहंता ममता का लय, देह का लय और जीव का लय तीनों ही होते हैं।